महाशिवरात्रि पर चांटीडीह मेला पारा में सजा पांच दिवसीय मेला, उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़


बिलासपुर। भारत पर्वों और उत्सवों का देश है, जहां हर त्योहार को उल्लास और आस्था के साथ मनाने की परंपरा रही है। इन्हीं पर्वों में एक प्रमुख है महाशिवरात्रि, जिसे देवों के देव महादेव के शिवलिंग रूप में प्राकट्य उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। इस अवसर पर प्राचीन मेलों की परंपरा भी जीवित है।
बिलासपुर में अरपा पार चांटीडीह स्थित मेला पारा में महाशिवरात्रि के अवसर पर पांच दिवसीय भव्य मेले की शुरुआत रविवार से हुई। पहले ही दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण क्षेत्र के लोग मेले का आनंद लेने पहुंचे। यही मेला इस क्षेत्र की पहचान बन चुका है और इसी के कारण इस स्थान को ‘मेला पारा’ नाम मिला।

आस्था और परंपरा का संगम
चांटीडीह स्थित शिव मंदिर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के संरक्षक दया शंकर सोनी ने बताया कि यह मंदिर लगभग 93 वर्ष पुराना है। इसकी स्थापना उनके दादा मंगली प्रसाद सोनी ने चार धाम यात्रा से लौटने के बाद की थी। यहां चार धाम के प्रतीक स्वरूप मंदिर और प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।
मंदिर स्थापना के बाद मंगली प्रसाद सोनी ने परिचित व्यापारियों से शिवरात्रि पर मेला लगाने का आग्रह किया था और नुकसान होने पर भरपाई का आश्वासन भी दिया था। लेकिन मेले में व्यापारियों को लाभ हुआ, जिसके बाद यह परंपरा हर वर्ष जारी रही। समय के साथ मेले का स्वरूप विस्तृत होता गया और आज यह लगभग एक शताब्दी पुरानी पहचान बन चुका है।

ग्रामीण मेले की जीवंत झलक
मेला पारा में आयोजित यह मेला ग्रामीण संस्कृति का जीवंत उदाहरण है। एक ओर श्रद्धालु महादेव का जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करने पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मेले में झूले, मिठाइयों की दुकानें, उखरा, लकड़ी के खिलौने, तलवारें, सौंदर्य प्रसाधन और सजावटी सामग्री सहित विभिन्न वस्तुओं की दुकानें सजी हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए आकर्षण का केंद्र बना यह मेला देर रात तक गुलजार रहा।

ध्वज चढ़ाने और शोभायात्रा की परंपरा
मंदिर में ध्वज चढ़ाने की विशेष परंपरा भी है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु ध्वज अर्पित करते हैं। इसके अलावा बैंडबाजा पार्टी, कुम्हार समाज, किन्नर समाज, बजरंग दल और शिव सेना की ओर से भी ध्वज चढ़ाया जाता है। ध्वज यात्रा के रूप में शोभायात्रा निकालकर मंदिर तक पहुंचाया जाता है।

हजारों श्रद्धालुओं ने किया जलाभिषेक
महाशिवरात्रि के दिन सुबह से ही मंदिर परिसर में हजारों शिव भक्तों की कतार लगी रही। श्रद्धालुओं ने जल, दूध और बेलपत्र अर्पित कर भोले भंडारी से मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद मांगा।


करीब एक सदी से चली आ रही यह परंपरा आज भी आस्था, व्यापार और सामाजिक समरसता का प्रतीक बनी हुई है। चांटीडीह का मेला न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि बिलासपुर की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

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