“संसार की नश्वरता और सत्य का प्रतीक हैं माँ धूमावती” – पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) सरकंडा स्थित सुभाष चौक के प्रतिष्ठित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में इस वर्ष माघ गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है,गुप्त नवरात्रि के सातवें दिन माता का धूमावती देवी के रूप में पूजन आराधना किया जाएगा। साथ ही अष्टमी को बगलामुखी देवी का विशेष पूजन किया जाएगा।

पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि
जहाँ देवियाँ सौंदर्य और शक्ति का प्रतीक हैं, वहीं माँ धूमावती अभाव, वैराग्य और सत्य की प्रतीक हैं।

कथाओं और तंत्र ग्रंथों (जैसे देवी माहात्म्य) के अनुसार, माँ धूमावती का संबंध धुम्रलोचन नामक राक्षस के वध से गहराई से जुड़ा है, जब शुंभ और निशुंभ नामक दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, तब देवताओं की रक्षा के लिए देवी कौशिकी (अंबिका) प्रकट हुईं। शुंभ ने अपने सेनापति धुम्रलोचन को देवी को पकड़कर लाने के लिए भेजा।जब धुम्रलोचन देवी के पास पहुँचा, तब देवी ने एक भयानक ‘हुंकार’ (गर्जना) भरी। इस हुंकार से उत्पन्न हुई शक्ति और धुएं ने धुम्रलोचन को क्षण भर में जलाकर भस्म कर दिया,ग्रंथों में माना जाता है कि चूँकि उन्होंने धुएं (धूम्र) के माध्यम से राक्षस का अंत किया और उनका अपना स्वरूप भी धुएं जैसा है, इसीलिए उन्हें ‘धूमावती’ कहा गया। वे शत्रुओं का नाश करने के लिए जानी जाती हैं, चाहे वे बाहरी शत्रु हों या आंतरिक (जैसे अहंकार और अज्ञान)।

धूमावती को “महाप्रलय” के बाद की स्थिति माना जाता है। जब पूरी सृष्टि नष्ट हो जाती है, तब केवल धुआं और शून्यता बचती है—वही माँ धूमावती हैं। वे हमें सिखाती हैं कि संसार में सुख-दुख, सुंदरता-कुरूपता सब अस्थायी हैं।

वे एक विधवा के रूप में सफेद साड़ी पहनती हैं, जो पूर्ण त्याग का प्रतीक है।उनके बिखरे हुए बाल विक्षिप्तता और सामाजिक बंधनों से मुक्ति दर्शाते हैं।
वे हाथ में अनाज साफ करने वाला ‘सूप’ रखती हैं। इसका अर्थ है कि वे भक्त के जीवन से ‘कचरा’ (बुराइयाँ) बाहर निकाल देती हैं और केवल ‘सार’ (सत्य) को बचाती हैं।उनका वाहन कौआ है, जिसे अक्सर अशुभ माना जाता है, लेकिन यह तीक्ष्ण बुद्धि और पूर्वजों का संदेशवाहक भी माना जाता है।

सुहागिन महिलाओं को उनकी मूर्ति का स्पर्श नहीं करना चाहिए और केवल दूर से दर्शन करने चाहिए, क्योंकि वे वैराग्य की अधिष्ठात्री हैं।

भले ही उनका रूप डरावना लगे, लेकिन वे “सौभाग्य की जननी” भी कही जाती हैं। वे हमारे जीवन से दरिद्रता, कलह और रोगों को सोख लेती हैं। वे उस कड़वी दवा की तरह हैं जो बीमारी को जड़ से मिटा देती है।

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