श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर (बिलासपुर) में माघ गुप्त नवरात्रि का आयोजन किया जा रहा

बिलासपुर (छत्तीसगढ़): सरकंडा स्थित सुभाष चौक के प्रतिष्ठित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में इस वर्ष माघ गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। गुप्त नवरात्रि में 10 महाविद्याओं की साधना की जाती है। इस अवसर पर गुप्त नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मशक्ति बगलामुखी देवी का पूजन श्रृंगार तारा देवी के रूप में किया जाएगा, इस अवसर पर प्रतिदिन प्रातःकालीन श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक, पूजन एवं परमब्रह्म मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी का पूजन,श्रृंगार, श्री सिद्धिविनायक जी का पूजन श्रृंगार,एवं श्री महाकाली,महालक्ष्मी, महासरस्वती राजराजेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी देवी का श्रीसूक्त षोडश मंत्र द्वारा दूधधारियाँ पूर्वक अभिषेक किया जाएगा।

पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि माता तारा का स्वरूप माता काली से काफी मिलता-जुलता है। वे नील वर्ण की हैं, बाघ की खाल के वस्त्र धारण करती हैं और उनके चारों हाथों में खड्ग, कैंची (कर्तरी), कपाल और कमल का फूल होता है। वे भगवान शिव के ‘अक्षोभ्य’ रूप के ऊपर विराजमान हैं।

बहुत समय पहले ‘हयग्रीव’ नाम के एक असुर ने वेदों को चुरा लिया था और ज्ञान का लोप होने लगा था। तब माता तारा ने नील वर्ण धारण कर उस असुर का वध किया और वेदों को पुनः सुरक्षित किया। ज्ञान की रक्षा करने और नील वर्ण होने के कारण उन्हें ‘नील सरस्वती’ कहा गया।
इन्हें ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वाक-सिद्धि (वाणी की शक्ति) और तीव्र बुद्धि प्राप्त करने के लिए इनकी साधना की जाती है। माना जाता है कि महाकवि कालिदास को इन्हीं की कृपा से पांडित्य प्राप्त हुआ था।माता तारा को धन और ऐश्वर्य देने वाली देवी माना गया है। कर्ज मुक्ति और दरिद्रता दूर करने के लिए इनका पूजन अचूक है।

जो लोग शिक्षा, न्याय, राजनीति या लेखन के क्षेत्र में हैं, उनके लिए गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन माता तारा की ‘नील सरस्वती’ के रूप में पूजा करना अत्यंत फलदायी होता है। ऐसा माना जाता है कि इनकी कृपा से मंदबुद्धि व्यक्ति भी विद्वान बन सकता है।

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