जमानत आवेदनों का बदला फॉर्मेट, अब देनी होगी पूरी कानूनी जानकारी

बिलासपुर। अदालतों में दाखिल किए जाने वाले नियमित और अग्रिम जमानत आवेदनों के प्रारूप में बड़ा बदलाव किया गया है। द्वारा लागू किए गए नए नियमों के तहत अब आवेदकों को अपने आवेदन के साथ विस्तृत सारणीबद्ध जानकारी देना अनिवार्य होगा। यह व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है।

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के हस्ताक्षर से बुधवार को जारी अधिसूचना में बताया गया है कि हाईकोर्ट रूल्स 2007 के नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं। नए प्रारूप का उद्देश्य अदालत के समक्ष मामले की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना और जमानत प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है।

नए नियमों के अनुसार अब जमानत आवेदन में केवल अपराध क्रमांक और धाराएं लिखना पर्याप्त नहीं होगा। आवेदक को एफआईआर नंबर, घटना की तारीख, संबंधित थाना और जिला, लागू धाराएं तथा उन धाराओं में निर्धारित अधिकतम सजा की जानकारी देना अनिवार्य होगा।

नियमित जमानत आवेदन में यह भी बताना होगा कि आरोपी की गिरफ्तारी कब हुई और वह अब तक कितने समय से जेल में निरुद्ध है। इसके साथ ही केस की वर्तमान स्थिति का पूरा ब्यौरा देना होगा, जिसमें जांच की प्रगति, चार्जशीट दाखिल होने की स्थिति और ट्रायल किस चरण में है, इसकी जानकारी शामिल रहेगी।

गवाहों और आपराधिक रिकॉर्ड की भी देनी होगी जानकारी

नए प्रारूप के तहत आवेदक को यह भी बताना होगा कि मामले में कुल कितने गवाह हैं और अब तक कितनों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। इसके अलावा आवेदक का आपराधिक इतिहास भी आवेदन का अनिवार्य हिस्सा होगा। यदि उसके खिलाफ अन्य प्रकरण दर्ज हैं, तो संबंधित एफआईआर नंबर, धाराएं और उन मामलों की वर्तमान स्थिति का चार्ट प्रस्तुत करना होगा। इसमें यह भी उल्लेख करना होगा कि मामला लंबित है, आरोपी बरी हुआ है या सजा हो चुकी है।

साथ ही, पूर्व में दाखिल जमानत आवेदनों और उनके परिणामों की जानकारी देना भी जरूरी होगा। आवेदन में यह भी स्पष्ट करना होगा कि आवेदक के खिलाफ कभी गैर-जमानती वारंट जारी हुआ है या उसे घोषित अपराधी करार दिया गया है।

हाईकोर्ट प्रशासन ने अधिसूचना की प्रतियां राज्य के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों, फैमिली कोर्ट के न्यायाधीशों, एडवोकेट जनरल कार्यालय तथा बार एसोसिएशन के अध्यक्षों को भेज दी हैं। अधिसूचना को में भी प्रकाशित किया गया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से अदालतों का समय बचेगा और गलत या अधूरी जानकारी देकर जमानत प्राप्त करने की कोशिशों पर प्रभावी रोक लग सकेगी।

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