
यूनुस मेमन

रतनपुर। धार्मिक, ऐतिहासिक एवं पौराणिक नगरी रतनपुर में सदियों से आयोजित होने वाला प्रसिद्ध मेला इस वर्ष प्रशासनिक निर्णयों और बदले स्वरूप को लेकर चर्चा में है। वर्षों से मेले के साथ आयोजित होने वाला आदिवासी विकास मेला इस बार नहीं लगाए जाने से जहां नगरवासियों में नाराजगी है, वहीं मेले के उद्घाटन समारोह में भी अपेक्षित जनउत्साह नजर नहीं आया।
रतनपुर ऐतिहासिक मेले का उद्घाटन समारोह विधिवत रूप से आयोजित किया गया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम अरुण साव, बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला सहित अन्य जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। मंच से आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और मेलों के संरक्षण की बात कही गई तथा भविष्य में आयोजन को और भव्य बनाने का आश्वासन भी दिया गया, लेकिन इसके बावजूद उद्घाटन कार्यक्रम में आम जनता की भागीदारी सीमित रही।

मेला परिसर और कार्यक्रम स्थल पर रखी कुर्सियां आधे से अधिक खाली नजर आईं। सीमित संख्या में नगरवासी ही उद्घाटन समारोह देखने पहुंचे, जिससे आयोजन की भव्यता फीकी पड़ती दिखी। नगरवासियों का कहना है कि आदिवासी विकास मेला बंद किए जाने और प्रचार-प्रसार की कमी का सीधा असर भीड़ पर पड़ा है।
गौरतलब है कि रतनपुर मेले का इतिहास लगभग 500 वर्षों पुराना है। अट्ठाईस रानियों के सती होने की स्मृति में आठाबीसा तालाब के तट पर यह परंपरागत मेला सदियों से आयोजित होता आ रहा है। वहीं लगभग 25–30 वर्ष पूर्व कोटा क्षेत्र के तत्कालीन विधायक स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल के प्रयासों से धान मंडी प्रांगण में सात दिवसीय आदिवासी विकास मेला प्रारंभ किया गया था, जिसने मेले को एक अलग पहचान दिलाई।
नगरवासियों का आरोप है कि विकास मेला हटाए जाने से मेले की मूल भावना, उद्देश्य और आकर्षण प्रभावित हुआ है। लोगों ने सवाल उठाया है कि जब केंद्र, राज्य और नगर—तीनों स्तरों पर “ट्रिपल इंजन की सरकार” है, तब भी यदि ऐतिहासिक और विकासोन्मुखी आयोजन सिमटते जा रहे हैं, तो यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि आने वाले वर्षों में आदिवासी विकास मेले को पुनः प्रारंभ किया जाए, ताकि रतनपुर मेले की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और विकासात्मक पहचान बनी रह सके।
