

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) सरकंडा स्थित सुभाष चौक के प्रतिष्ठित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में इस वर्ष माघ गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। गुप्त नवरात्रि में 10 महाविद्याओं की साधना की जाती है। इस अवसर पर गुप्त नवरात्रि के पांचवें दिन बसंत पंचमी के पावन पर्व पर माँ ब्रह्मशक्ति बगलामुखी देवी का पूजन, आराधना भुवनेश्वरी एवं सरस्वती देवी के रूप में किया जाएगा, इस अवसर पर प्रतिदिन प्रातःकालीन श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक, पूजन एवं परमब्रह्म मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी का पूजन,श्रृंगार, श्री सिद्धिविनायक जी का पूजन श्रृंगार,एवं श्री महाकाली,महालक्ष्मी, महासरस्वती राजराजेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी देवी का श्रीसूक्त षोडश मंत्र द्वारा दूधधारियाँ पूर्वक अभिषेक किया जा रहा हैं।
पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि माँ भुवनेश्वरी और वसंत पंचमी भारतीय संस्कृति और आध्यात्म के दो अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जहाँ एक ओर माँ भुवनेश्वरी ब्रह्मांड की आधारभूत शक्ति हैं, वहीं वसंत पंचमी ज्ञान और नई चेतना के उदय का पर्व है।
दस महाविद्याओं में पाँचवी महाविद्या माँ भुवनेश्वरी हैं। ‘भुवन’ का अर्थ है लोक या ब्रह्मांड और ‘ईश्वरी’ का अर्थ है शासन करने वाली। अर्थात, वह देवी जो समस्त ब्रह्मांड पर शासन करती हैं। उन्हें सगुण ब्रह्म का साक्षात स्वरूप माना जाता है। माँ भुवनेश्वरी का स्वरूप अत्यंत सौम्य और ओजस्वी है। उनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है और उनके तीन नेत्र हैं। वे अपने हाथों में पाश (अंकुश) और वरद एवं अभय मुद्रा धारण करती हैं। उनका शरीर उदय होते सूर्य की लालिमा के समान चमकता है, जो ऊर्जा का प्रतीक है। माँ भुवनेश्वरी के संकल्प से ही इस संसार की रचना हुई है। वे ही पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को नियंत्रित करती हैं।इनकी पूजा से व्यक्ति को सांसारिक सुख, धन, संपत्ति और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है, भुवनेश्वरी साधना से साधक निर्भय हो जाता है। तंत्र शास्त्र में उन्हें सभी सिद्धियों को देने वाली माता कहा गया है।
वसंत पंचमी ज्ञान और ऋतु परिवर्तन का पर्व है। वसंत पंचमी मुख्य रूप से दो कारणों से मनाई जाती है-
ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की, तो उन्हें चारों ओर मौन और शांति दिखाई दी। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक दिव्य देवी प्रकट हुईं जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक और माला थी। उन देवी ने जैसे ही वीणा बजाई, संसार में वाणी और संगीत का संचार हुआ। वह दिन माघ शुक्ल पंचमी का था, इसीलिए इस दिन को सरस्वती प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन से कड़ाके की ठंड कम होने लगती है और प्रकृति में नया उल्लास दिखाई देता है। खेतों में सरसों के पीले फूल लहलहाने लगते हैं और पेड़ों पर नई कोपलें आती हैं।
माँ सरस्वती मुख्य रूप से विद्या, बुद्धि, कला और संगीत की देवी माँ सरस्वती की पूजा की जाती है। छात्र अपनी पुस्तकों और कलाकार अपने वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं।
वसंत को प्रेम का ऋतु माना जाता है, इसलिए प्राचीन काल में इस दिन कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा का भी विधान था।
माँ भुवनेश्वरी और वसंत पंचमी का आध्यात्मिक मेल है।वसंत पंचमी का दिन साधना के लिए ‘अबूझ मुहूर्त’ (अत्यंत शुभ समय) माना जाता है। कई साधक इस दिन माँ सरस्वती के साथ-साथ माँ भुवनेश्वरी की भी विशेष साधना करते हैं क्योकि ज्ञान और शक्ति का संगम जहाँ सरस्वती ‘ज्ञान’ हैं, वहीं भुवनेश्वरी उस ज्ञान को क्रियान्वित करने वाली ‘शक्ति’ हैं। वसंत पंचमी पर पीले रंग का महत्व है, और माँ भुवनेश्वरी का तेज भी स्वर्णिम-पीला माना जाता है। यह रंग ऊर्जा, उत्साह और समृद्धि को दर्शाता है।
