“पत्रकार को मारने की कोशिश : मैकल पर्वत में माफिया का खुला आतंक

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही, छत्तीसगढ़ |

छत्तीसगढ़ के अमरकंटक–मैकल पर्वत श्रृंखला क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन और जंगलों की लूट पर सवाल उठाना अब जानलेवा बन चुका है। 8 जनवरी 2026 की शाम, पत्रकार सुशांत गौतम पर किया गया हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं था — यह उस पूरी पत्रकारिता पर हमला था जो जंगल, पानी और पहाड़ को बचाने की कोशिश कर रही है।
सुशांत गौतम उस दिन अमरकंटक और मैकल पर्वत श्रृंखला क्षेत्र से अवैध खनन पर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर लौट रहे थे। वे पहले भी इस क्षेत्र में क्रशर, खनन और पर्यावरणीय विनाश पर लगातार रिपोर्टिंग करते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली हिल्स को लेकर दिखाई गई सख्ती के संदर्भ में उन्होंने यह सवाल उठाया था कि अगर अरावली बच सकती है तो अमरकंटक और मैकल पर्वत क्यों नहीं।
यही सवाल माफिया को चुभ गया।

हाईवा, फोर व्हीलर और कार से घेरकर रास्ता बंद किया गया

जब सुशांत गौतम अपने साथी रितेश गुप्ता के साथ खबर बनाकर लौट रहे थे, तभी जीपीएम जिले के धनौली गांव के पास अचानक एक सफेद कार उनकी गाड़ी के सामने आकर अड़ गई। उसी समय एक हाईवा साइड में लगा दी गई और पीछे से एक फोर-व्हीलर आकर रुक गई। उनकी गाड़ी को चारों ओर से घेर लिया गया।
यह सड़क पर हुआ कोई संयोग नहीं था। यह एक सुनियोजित घात थी।
इसके बाद गालियाँ दी गईं, धमकियाँ दी गईं और कहा गया — “दरवाज़ा खोल, बाहर उतर।”

लोहे की रॉड से हमला, काँच तोड़ा गया, पत्रकार घायल

इसी दौरान एक हमलावर ने लोहे की रॉड से ड्राइवर साइड के काँच पर जोरदार वार किया। काँच चकनाचूर हो गया। उसके टुकड़े सुशांत गौतम के चेहरे और माथे तक जा लगे। खून बहा। जान का खतरा पैदा हो गया।
यह हमला किसी गुस्से में नहीं था। यह सोच-समझकर किया गया वार था।
सुशांत गौतम का मेडिकल कराया गया है और उनके चेहरे पर आई चोटों की तस्वीरें और वीडियो पुलिस के पास मौजूद हैं।

मोबाइल छीना गया ताकि सबूत न बचे

सबसे गंभीर बात यह रही कि इसी दौरान उनके सहयोगी रितेश गुप्ता का मोबाइल फोन जबरन छीन लिया गया और बंद कर दिया गया, ताकि वे किसी से संपर्क न कर सकें और वीडियो रिकॉर्डिंग न बच सके। सुशांत गौतम के मोबाइल के साथ भी जबरदस्ती की गई।
यह साफ बताता है कि हमला सिर्फ डराने के लिए नहीं था — यह सबूत मिटाने और खबर दबाने की कोशिश थी।

FIR दर्ज, हत्या की कोशिश का मामला

घटना के बाद सुशांत गौतम सीधे गौरेला थाना पहुंचे और लिखित शिकायत दी। पुलिस ने FIR नंबर 0014/2026 दर्ज किया है। इसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ लगाई गई हैं जो हत्या की कोशिश, खतरनाक हथियार से हमला, आपराधिक धमकी और सामूहिक अपराध जैसे गंभीर अपराधों को दर्शाती हैं।
यह कोई साधारण केस नहीं है। यह संज्ञेय और गंभीर अपराध है।

तीन नामजद आरोपी, खनन नेटवर्क से जुड़ाव

FIR में तीन लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया है — जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू), ललन तिवारी और सुनील बाली। स्थानीय स्तर पर इन नामों का संबंध उसी इलाके में चल रहे अवैध क्रेशर और खनन गतिविधियों से बताया जाता है।
यानी हमला वहीं से आया जहाँ पर सुशांत गौतम की रिपोर्टिंग चोट कर रही थी।

माफिया का पैटर्न: हमला, फिर डर, फिर झूठे केस

हमले के बाद अब पत्रकार पर समझौते का दबाव, धमकियाँ और यहां तक कि दूसरे इलाकों में झूठी शिकायतें दर्ज कराने के संकेत भी मिल रहे हैं। यह वही तरीका है जो खनन और जमीन माफिया हमेशा अपनाते हैं — पहले हमला करो, फिर डर पैदा करो और फिर पीड़ित को ही आरोपी बनाने की कोशिश करो।

मुकेश चंद्राकर की हत्या की याद दिलाता यह हमला

छत्तीसगढ़ पहले ही देख चुका है कि रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार मुकेश चंद्राकर को कैसे मारा गया था और उनका शव सेप्टिक टैंक में मिला था। सुशांत गौतम आज जिंदा हैं, लेकिन यह सिर्फ उनकी सूझबूझ और किस्मत की वजह से है।
अगर वे उस समय गाड़ी से उतर जाते, तो आज यह खबर नहीं होती — आज उनकी मौत की खबर होती।

यह हमला सिर्फ एक पत्रकार पर नहीं, लोकतंत्र पर था

अमरकंटक और मैकल पर्वत सिर्फ पहाड़ नहीं हैं। वे जंगल हैं, जलस्रोत हैं और लाखों लोगों के जीवन का आधार हैं। इन पर चल रहे अवैध खनन को उजागर करना अगर अपराध बन जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।
सुशांत गौतम पर हुआ हमला इस बात का सबूत है कि माफिया अब खबर से डरता है — और इसलिए खबर को मारना चाहता है।

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