
आकाश दत्त मिश्रा

बिलासपुर, 25 अप्रैल 2026। शहर के गोड़पारा क्षेत्र में एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने परंपराओं, संवेदनाओं और सामाजिक सोच—तीनों को एक साथ झकझोर दिया। अपने पिता के निधन के बाद एक बेटी ने न केवल साहस का परिचय दिया, बल्कि समाज के सामने एक नई दिशा भी प्रस्तुत की।
गोड़पारा निवासी सदन लाल सोनी का 24 अप्रैल को आकस्मिक निधन हो गया। उनके परिवार में इकलौती संतान के रूप में उनकी बेटी राधिका परिहार ही थीं। पिता के निधन के बाद अंतिम संस्कार की घड़ी आई, तो एक कठिन प्रश्न सामने था—मुखाग्नि कौन देगा? परंपरागत रूप से यह अधिकार पुत्र को दिया जाता रहा है, लेकिन यहां कोई पुत्र नहीं था।
ऐसे में राधिका ने वह निर्णय लिया, जो केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि गहरे प्रेम और आत्मबल का प्रतीक बन गया। उन्होंने स्वयं अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया और पूरे संस्कार के साथ उन्हें मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी।
यह दृश्य केवल एक संस्कार नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक क्षण था—जहां एक बेटी ने अपने पिता के प्रति अपने प्रेम, दायित्व और सम्मान को समाज के सामने जीवंत कर दिया। श्मशान घाट पर मौजूद लोगों की आंखें नम थीं, और हर कोई इस साहसिक कदम का साक्षी बन रहा था।
राधिका का यह कदम उन रूढ़ियों को चुनौती देता है, जिनमें बेटियों को कई बार अंतिम संस्कार जैसे कर्तव्यों से दूर रखा जाता रहा है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि संबंधों की गहराई का कोई लिंग नहीं होता—न बेटी कम होती है, न उसका स्नेह, न उसका अधिकार।
यह घटना केवल एक परिवार की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश है—कि समय के साथ परंपराओं की व्याख्या भी बदलनी चाहिए। जहां संवेदना, समानता और मानवता सर्वोपरि हो, वहीं सच्चे अर्थों में संस्कार जीवित रहते हैं।
राधिका परिहार का यह साहसिक कदम अब शहरभर में चर्चा का विषय है। लोग इसे एक प्रेरणादायक उदाहरण के रूप में देख रहे हैं—जहां एक बेटी ने न केवल अपने पिता को विदाई दी, बल्कि समाज को एक नई सोच भी दी।
