

श्री पीतांबरा पीठ त्रिदेव मंदिर में 15 फरवरी महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर प्रातःकालीन 5:00 बजे से अखंड महारुद्राभिषेक प्रारंभ होगा जो कि दूसरे दिन 16 फरवरी प्रात: 5:00 बजे तक प्रयागराज से आए हुए विद्वानों के मंत्रोच्चारण के साथ निरंतर चलेगा,तत्पश्चात 16 फरवरी को प्रातः 9:00 बजे से नि:शुल्क रुद्राक्ष का वितरण किया जाएगा। साथ ही महाशिवरात्रि के दिन रात्रि के चार पहर पर विशेष पूजन किया जाएगा।
पीतांबरा पीठाधीश्वर स्वामी श्री दिनेश जी महाराज ने बताया कि महाशिवरात्रि केवल एक व्रत या त्योहार नहीं है, बल्कि यह वह महान कालखंड है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा और मानव चेतना का मिलन होता है। भारतीय दर्शन और साधना मार्ग में इसका महत्व अद्वितीय है।’शिव’ का अर्थ है कल्याण और ‘रात्रि’ का अर्थ है वह समय जो हमें शांति और विश्राम प्रदान करे। फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है कि मनुष्य की रीढ़ की हड्डी में ऊर्जा का प्रवाह स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर (ऊर्ध्वगमन) होने लगता है। यह रात आध्यात्मिक साधक के लिए प्रकृति की ओर से मिलने वाला एक उपहार है।
शिव-शक्ति का मिलन: इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यह वैराग्य (शिव) और शक्ति (पार्वती) के संतुलन का उत्सव है।
लिंगोद्भव काल: शिव पुराण के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव पहली बार ‘अग्नि स्तंभ’ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए थे।
विषपान (नीलकंठ): समुद्र मंथन के हलाहल विष को पीकर शिव ने इसी रात्रि सृष्टि की रक्षा की थी।
चार पहर की पूजा और चार पुरुषार्थ की सिद्धि
पीतांबरा पीठाधीश्वर स्वामी दिनेश जी महाराज ने बताया कि भारतीय संस्कृति के चार लक्ष्यों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करने के लिए महाशिवरात्रि की चार पहर की पूजा का विधान है-
चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के लिए अलग-अलग चीजों से अभिषेक करने का महत्व है:
धर्म – कुश जल: कुश को पवित्र माना जाता है, जो भगवान शिव को प्रिय है। कुश जल से अभिषेक करने से धर्म की प्राप्ति होती है, और व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास होता है।कर्तव्य’ और ‘सदाचार’ है। समाज और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को ईमानदारी से निभाना और नैतिक मार्ग पर चलना ‘धर्म’ है।
अर्थ – गन्ना रस: गन्ना रस से अभिषेक करने से अर्थ की प्राप्ति होती है, यानी धन-धान्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
जीवन जीने के लिए आवश्यक भौतिक संसाधन, धन और संपत्ति। बिना अर्थ के धर्म का पालन कठिन है, लेकिन ‘अर्थ’ न्यायपूर्ण तरीके से कमाया जाना चाहिए।
काम – दूध: गाय के दूध से अभिषेक करने से काम की प्राप्ति होती है, यानी व्यक्ति की कामनाएं पूरी होती हैं। इच्छाएं, प्रेम और सुख का उपभोग। मन की कामनाओं को संतुलित रखना और उन्हें उचित दिशा देना ‘काम’ पुरुषार्थ है।
मोक्ष – गंगा जल: गंगा जल से अभिषेक करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, यानी आत्मा को मुक्ति मिलती है। गंगा जल पवित्र और शुद्ध माना जाता है, जो भगवान शिव को प्रिय है।यह अंतिम लक्ष्य है। जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, अज्ञानता का नाश और स्वयं का परमात्मा (शिव) में विलीन हो जाना ही ‘मोक्ष’ है।
इन चीजों से अभिषेक करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, और व्यक्ति को चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
चतुर्थ पुरुषार्थ ‘मोक्ष’ की सिद्धि के मार्ग ‘मोक्ष’ का अर्थ मृत्यु नहीं, बल्कि जीते-जी अज्ञान और मोह के बंधनों से मुक्त होना है। इस रात्रि इसे सिद्ध करने के विशेष तरीके हैं:
सजग जागरण- केवल जागना पर्याप्त नहीं है; रीढ़ सीधी रखकर ध्यान में बैठने से ‘कुंडलिनी शक्ति’ सहस्रार चक्र की ओर बढ़ती है, जो आत्मज्ञान का मार्ग है।
शून्य का ध्यान: शिव ‘अद्वैत’ हैं। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ही ब्रह्म हूँ) के भाव से स्वयं के अहंकार को शून्य में विलीन करना ही वास्तविक मोक्ष है।
रुद्राभिषेक और पूर्ण समर्पण: अभिषेक करते समय अपनी वासनाओं को त्यागना। जब ‘स्व’ (अहंकार) समाप्त होता है, तभी ‘शिव’ (कल्याण) का उदय होता है।
महामृत्युंजय जाप: इस मंत्र का मानसिक जाप अज्ञानता के भय को मिटाकर साधक को अमृतत्व (अमरता) की ओर ले जाता हैं। महाशिवरात्रि अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने की यात्रा है। जहाँ अन्य रातें नींद और तामसिक सुख के लिए होती हैं, वहीं यह रात चेतना के उच्चतम स्तर को छूने के लिए है। जो व्यक्ति निष्काम भाव और समर्पण के साथ इस रात्रि शिव की शरण में जाता है, उसे चतुर्थ पुरुषार्थ अर्थात ‘मोक्ष’ की सहज ही प्राप्ति हो जाती है।
16 फरवरी सोमवार को प्रातः 9:00 से दोपहर 2:00 बजे तक नि:शुल्क रुद्राक्ष का वितरण किया जाएगा।
