
बिलासपुर, 25 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में फैसला सुनाते हुए इकलौती संतान खो चुके दंपती को इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) के जरिए दोबारा माता-पिता बनने की अनुमति प्रदान की है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “संतान सुख” भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
पृष्ठभूमि: व्यक्तिगत त्रासदी से न्यायालय तक
बिलासपुर के हाई कोर्ट कॉलोनी निवासी 49 वर्षीय महिला और उनके 55 वर्षीय पति ने याचिका दायर कर बताया कि वर्ष 2022 में उनकी इकलौती बेटी का असामयिक निधन हो गया था। इस घटना के बाद दंपती गहरे मानसिक और भावनात्मक आघात से गुजर रहे थे।
समय के साथ स्थिति संभालने के बाद उन्होंने पुनः परिवार शुरू करने का निर्णय लिया और शहर के एक निजी IVF केंद्र में परामर्श लिया। चिकित्सकीय जांच में दोनों को उपचार के लिए फिट पाया गया।
कानूनी अड़चन: उम्र सीमा बनी बाधा
हालांकि, Assisted Reproductive Technology (Regulation) Act, 2021 के प्रावधानों के तहत पुरुष की अधिकतम आयु 55 वर्ष और महिला की 50 वर्ष निर्धारित है। चूंकि पति फरवरी 2026 में 55 वर्ष की आयु पार कर चुके थे, इसलिए IVF केंद्र ने उपचार शुरू करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि संतान प्राप्ति का अधिकार व्यक्ति की गरिमा और जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित आयु सीमा पति-पत्नी पर “व्यक्तिगत रूप से” लागू होती है, न कि सामूहिक रूप से। चूंकि पत्नी की आयु 50 वर्ष से कम है और वह चिकित्सकीय रूप से सक्षम है, इसलिए केवल पति की आयु के आधार पर दंपती को IVF से वंचित नहीं किया जा सकता।
विशेष परिस्थिति को दी प्राथमिकता
न्यायालय ने दंपती की इकलौती संतान की मृत्यु को “विशेष और असाधारण परिस्थिति” मानते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने संबंधित IVF केंद्र को निर्देश दिया कि उपचार तत्काल प्रारंभ किया जाए और प्रक्रिया को बीच में रोका न जाए।
व्यापक महत्व
यह फैसला न केवल संबंधित दंपती के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत भी स्थापित करता है, जहां व्यक्तिगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कानून की व्याख्या की जा सकती है।
उच्च न्यायालय का यह निर्णय संवैधानिक अधिकारों की व्यापक व्याख्या का उदाहरण है, जिसमें व्यक्तिगत पीड़ा और मानवीय पहलुओं को प्राथमिकता दी गई है। यह फैसला बताता है कि न्याय व्यवस्था केवल कानून के शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य और मानवीय संवेदनाओं को भी महत्व देती है।
