साहित्यिक संस्था स्पंदन में दिनांक 4 अक्टूबर 2026 को आभासीय साहित्यिक संध्या आयोजित की गयी. सभा का आरम्भ लखनऊ की युवा साहित्यकार वैशाली रस्तोगी द्वारा सरस्वती वंदना "स्वर पे सवार होके.. कंठ का श्रृंगार होके" के मधुर गायन से हुआ. कार्यक्रम में राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' की जयंती उत्सावित की गयी. उज्जैन की साहित्यशिल्पी श्रीमती मनीषा राठी ने दिनकर जी के जीवन व साहित्य में उनके योगदान पऱ गहनता से प्रकाश डाला. तदोपरान्त लंदन से कार्यक्रम में सहभागी बने वरिष्ठ साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ने दिनकर जी की कविता 'चाँद का कुरता' एवं गुरुग्राम की प्रीति अग्रवाल ने शक्ति और क्षमा की सुंदर प्रस्तुतियाँ दीं. अलीगढ़ की वरिष्ठ साहित्यकार आभा जी माहेश्वरी ने  अपने सृजन 'आत्मशक्ति' से सभी को आत्मबल से ओतप्रोत कर दिया. मनीषा राठी ने अपनी रचना 'धर्म अनुसंधान करो हे! अर्जुन' में कुरुक्षेत्र की रणभूमि में श्री कृष्ण का अर्जुन को प्रदत्त अमर सन्देश अर्थात सम्बन्धों की अपेक्षा कर्म प्रधान को अति मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया. विवेक रंजन श्रीवास्तव ने श्राद्धपक्ष पऱ केंद्रित लघुकथा श्रद्धा और सुमन प्रस्तुत कर सभी को भावविभोर कर दिया. प्रीति अग्रवाल ने अपने सस्मरण 'पहली तीज' में अपनी स्वर्गीय सासू माँ के साथ स्वयं का एक लघु किन्तु मृदु अनुभव साझा किया. वैशाली रस्तोगी की दिनकर जी की शैली में सृजित रचना ' 'हुंकार उठी बेड़ी टूटी' भी आकर्षण का केन्द्र रही.

स्पंदन के संस्थापक एवं अध्यक्ष प्रशान्त माहेश्वरी ने अपनी रचना 'गंध स्वाभिमान की' में स्वयं के स्वाभिमान के लिए सतत संघर्षरत गाँव में निवासरत महिला की जीवटता का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया. कार्यक्रम में बतौर श्रोता इन्दौर की युवा साहित्यकार सुश्री दिव्या भट्ट 'स्वयं', लखनऊ के व्यंग्यकार श्री अयोध्या प्रसाद जी एवं भोपाल की मनोवैज्ञानिक परामर्शदात्री डॉ. अनुपमा माहेश्वरी की प्रस्तुति भी उल्लेखनीय रही. अन्त में प्रीति अग्रवाल द्वारा आभार ज्ञापन के साथ कार्यक्रम सह आनन्द सम्पन्न हुआ.