बिलासपुर। 17 सूत्रीय मांगों को लेकर सिम्स के करीब 180 जूनियर डॉक्टर 24 से 26 सितंबर तक तीन दिवसीय सांकेतिक प्रदर्शन कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि पिछले छह महीने से शासन स्तर पर मांगों को लेकर बातचीत और आश्वासन का दौर चल रहा है, लेकिन अब तक किसी भी मांग पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया है। आंदोलन को लेकर जूनियर डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द निर्णय नहीं हुआ तो सोमवार से ओपीडी और इमरजेंसी सेवाएं भी पूरी तरह बंद की जा सकती हैं। प्रदेशभर में करीब 1200 जूनियर डॉक्टर इस आंदोलन से जुड़े बताए जा रहे हैं।

प्रदर्शन के चलते सिम्स प्रबंधन ने अस्पताल में मरीजों की सेवाएं प्रभावित न हों, इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था की है। डीन और एमएस ने अस्पताल का राउंड लेकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। ओपीडी और इमरजेंसी में सीनियर डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई गई है। इससे नियमित उपचार सेवाएं जारी रहीं, हालांकि कुछ मरीजों को इलाज के लिए इंतजार करना पड़ा।

छह महीने से मांगों पर चल रही बातचीत

जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि अपनी मांगों को लेकर वे पिछले छह महीने से शासन के सामने लगातार बात रख रहे हैं। कई दौर की बातचीत में मांगों पर विचार करने का आश्वासन भी मिला, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ। इसी के चलते प्रदेशभर के जूनियर डॉक्टरों ने आंदोलन का रास्ता अपनाया है।

सिम्स के जूनियर डॉक्टर नागेंद्र साहू ने बताया कि फिलहाल अस्पताल में नियमित सेवाएं जारी हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में करीब 1200 जूनियर डॉक्टर आंदोलन से जुड़े हैं और मांगें पूरी नहीं होने पर आंदोलन को आगे बढ़ाया जा सकता है।

स्टाइपेंड बढ़ाने समेत 17 मांगें

जूनियर डॉक्टरों की प्रमुख मांगों में स्टाइपेंड में वृद्धि, पड़ोसी राज्यों के समान स्टाइपेंड तय करना और सुपर स्पेशालिटी कैडर का गठन शामिल है। वर्तमान में जूनियर डॉक्टरों को 15,900 रुपए स्टाइपेंड मिल रहा है। इसके अलावा उनकी ओर से 17 सूत्रीय मांगें शासन के समक्ष रखी गई हैं।

इधर, सरकार ने एमबीबीएस इंटर्न का स्टाइपेंड बढ़ाकर 25 हजार रुपए करने का आदेश जारी किया है। हालांकि जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि उनकी अन्य मांगों पर भी ठोस निर्णय जरूरी है।

सीनियर डॉक्टरों ने संभाली व्यवस्था

सिम्स के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति ने कहा कि अस्पताल की ओपीडी और इमरजेंसी में सीनियर डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई गई है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था इस तरह की गई है कि किसी मरीज को बिना इलाज के वापस न लौटना पड़े। प्रबंधन की ओर से आंदोलन के दौरान मरीजों की सुविधा और आपातकालीन सेवाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।