महाषष्ठी से शुरू हुआ बंगाली समाज का दुर्गोत्सव, पंडालों में देवी के बोधन और आमंत्रण की रस्में पूरी; रेलवे क्षेत्र से लेकर शहर तक सजे आकर्षक पंडाल

बिलासपुर। शारदीय नवरात्र में जहां प्रतिपदा से देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जा रही है, वहीं बिलासपुर में दुर्गा पूजा के सबसे बड़े उत्सव की शुरुआत शुक्रवार को महाषष्ठी के साथ हुई। बंगाल की पारंपरिक पूजा पद्धति के अनुरूप यहां पांच दिनों तक मां दुर्गा की आराधना और उत्सव मनाया जाएगा। मान्यता है कि बंगाल के बाद बिलासपुर में भी दुर्गा पूजा की परंपरा बेहद भव्य और विशिष्ट स्वरूप में दिखाई देती है। शहर में एक ओर नवदुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा-अर्चना की जा रही है, तो दूसरी ओर बंगाली समाज के सार्वजनिक दुर्गोत्सव के लिए आकर्षक पंडाल सजाए गए हैं। रेलवे क्षेत्र से लेकर शहर के विभिन्न इलाकों में उत्सव का उल्लास दिखाई देने लगा है।

अकाल बोधन से जुड़ी है पांच दिवसीय पूजा की परंपरा

बंगाल की दुर्गा पूजा को अकाल बोधन की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण से युद्ध के दौरान विजय प्राप्त करने के लिए देवी दुर्गा का असमय आह्वान किया था। इसी प्रसंग को अकाल बोधन कहा जाता है। बंगाली परंपरा में माना जाता है कि मां दुर्गा अपने परिवार के साथ पांच दिनों के लिए मायके आती हैं। इसलिए महाषष्ठी से लेकर विजयादशमी तक देवी का स्वागत, पूजन और विशेष सत्कार किया जाता है। इसी परंपरा के अनुरूप बिलासपुर में भी बंगाली समाज का दुर्गोत्सव पांच दिनों तक मनाया जाता है।

महाषष्ठी पर देवी का आह्वान, बेल की टहनी से आमंत्रण

शुक्रवार को महाषष्ठी के साथ बंगाली समाज के पूजा पंडालों में धार्मिक अनुष्ठान शुरू हुए। देवी के आह्वान के साथ आमंत्रण और अधिवास की रस्में पूरी की गईं। बंगाल से आए पुजारियों के मार्गदर्शन में बोधन पूजन किया गया। परंपरा के अनुसार बेल के पेड़ की टहनी स्थापित कर देवी को आमंत्रित किया गया। इसके साथ ही पंडालों में विधिवत पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हो गया।

महा सप्तमी पर नवपत्रिका पूजन किया जाएगा। इसके तहत कोला बऊ स्नान के बाद नवपत्रिका की स्थापना होगी। महाष्टमी पर विशेष पूजा-अर्चना होगी। इसके बाद 18 अक्टूबर की सुबह 7:26 बजे से संधि पूजा शुरू होगी। नवमी तिथि पर 20 अक्टूबर को हवन किया जाएगा। इन धार्मिक अनुष्ठानों के साथ पांच दिवसीय दुर्गोत्सव आगे बढ़ेगा।

रेलवे क्षेत्र में परंपरा, शहरी पंडालों में सजावट का आकर्षण

बिलासपुर में दुर्गा पूजा की खासियत यह है कि यहां परंपरा और आधुनिक सजावट का अनूठा संगम देखने को मिलता है। रेलवे क्षेत्र के पूजा पंडालों में बंगाली रीति-रिवाजों और पारंपरिक अनुष्ठानों पर विशेष जोर रहता है, जबकि शहर के अन्य इलाकों में भव्य सजावट, आकर्षक थीम और कलात्मक पंडाल लोगों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं। इस वर्ष भी विभिन्न पूजा समितियों ने अपनी तैयारियों में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

धान मंडी चौक में श्री श्री विवेकानंद दुर्गा पूजा समिति का भव्य आयोजन

रेलवे क्षेत्र के धान मंडी चौक में श्री श्री विवेकानंद दुर्गा पूजा उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस वर्ष आयोजन का 20वां वर्ष है। समिति ने यहां आकर्षक पंडाल तैयार कराया है, जहां बंगाल की परंपरा के अनुरूप देवी की पूजा-अर्चना की जा रही है। पंडाल में चैतन्य देवियों की झांकी भी सजाई गई है। आयोजन के दौरान प्रतिदिन दोपहर में श्रद्धालुओं को भोग-प्रसाद वितरित किया जाएगा।

बंगाली एसोसिएशन का दुर्गोत्सव 103वें वर्ष में

बिलासपुर में दुर्गा पूजा की परंपरा एक सदी से भी अधिक पुरानी है। बंगाली एसोसिएशन का दुर्गोत्सव इस वर्ष 103वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इसकी शुरुआत चुचुहियापारा के पास बंगाल से आए कुछ रेलकर्मियों ने की थी। शुरुआती दौर में मां दुर्गा की प्रतिमा ट्रेन से कोलकाता से बिलासपुर लाई जाती थी। बाद में पूजा को बंगाली स्कूल परिसर में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्तमान में बंगाली एसोसिएशन इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।

बंगाली स्कूल परिसर में इस वर्ष भी आकर्षक पंडाल बनाया गया है। यहां पूजा-अर्चना के साथ पारंपरिक मेले का आयोजन भी किया जा रहा है। एक सदी से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा बिलासपुर में बंगाली समाज की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था की पहचान बन चुकी है।

आरटीएस कॉलोनी से तोरवा तक सजे पूजा पंडाल

बंगाली समाज के दुर्गोत्सव का आयोजन केवल बंगाली स्कूल और रेलवे क्षेत्र तक सीमित नहीं है। आरटीएस कॉलोनी, बंगला यार्ड, तारबाहर, हेमू नगर और तोरवा सहित विभिन्न इलाकों में भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां दुर्गा की पूजा की जा रही है। इन क्षेत्रों में पंडालों को आकर्षक ढंग से सजाया गया है, जहां महाषष्ठी से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई है।

तोरवा क्षेत्र में नवदुर्गा की आकर्षक प्रतिमा स्थापित की गई है। यहां विशाल पंडाल बनाया गया है और श्रद्धालुओं के लिए नौ दिनों तक भंडारे की व्यवस्था की गई है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में सजे पंडाल, धार्मिक अनुष्ठान और भोग-प्रसाद वितरण के आयोजन दुर्गोत्सव को विशेष बना रहे हैं।

बिलासपुर में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक सदी से अधिक समय से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा का उत्सव भी है। बंगाल की पूजा पद्धति, पारंपरिक मेले, आकर्षक झांकियां और सामूहिक आयोजन शहर की इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।