हाईकोर्ट ने पिता की अपील खारिज की, दूसरी शादी कर चुके शिक्षक का बच्चे से बचपन से नहीं रहा संपर्क; सुनवाई के दौरान पिता की ओर देखा तक नहीं
बिलासपुर। बच्चे को बेहतर शिक्षा और सुविधाएं देने की आर्थिक क्षमता मात्र से पिता को उसकी कस्टडी का अधिकार नहीं मिल जाता। बच्चे का कल्याण और उसकी मौजूदा परवरिश सबसे महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 7 साल के बच्चे की कस्टडी मांगने वाले सरकारी शिक्षक पिता की अपील खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जब मां बच्चे की देखभाल और पढ़ाई ठीक से कर रही है, तो उसे मौजूदा माहौल से हटाना उचित नहीं होगा।
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच में मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान एक भावनात्मक स्थिति भी सामने आई। 7 साल के बच्चे ने अदालत में अपने पिता की ओर देखा तक नहीं और न ही उनके साथ जाने की इच्छा जताई। पिता ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी।
मामला बलौदाबाजार निवासी दंपती से जुड़ा है। दोनों की शादी 28 अप्रैल 2015 को हुई थी। उनका एक बेटा है। बाद में दोनों के बीच तलाक हो गया और बच्चा मां के साथ रहने लगा। पिता ने फैमिली कोर्ट में बेटे की कस्टडी के लिए आवेदन दिया था। उनका तर्क था कि वे सरकारी शिक्षक हैं और संयुक्त परिवार में रहते हैं। परिवार के अन्य सदस्य भी बच्चे की देखभाल कर सकते हैं। वे बेटे को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में बेहतर शिक्षा और सुविधाएं देना चाहते हैं।
मां ने पेश की पढ़ाई की फीस की रसीदें
दूसरी ओर मां ने अदालत को बताया कि वह बेटे की पढ़ाई और परवरिश की जिम्मेदारी ठीक से निभा रही है। उसने आरोप लगाया कि बच्चे के जन्म के बाद से पिता ने न तो उसे देखने की कोशिश की और न ही अपने साथ रखने का प्रयास किया। भरण-पोषण की राशि भी नहीं दी जा रही है।
हाईकोर्ट ने पाया कि मां ने दूसरी कक्षा में पढ़ रहे बेटे की शिक्षा से संबंधित फीस की रसीदें पेश की थीं। इससे स्पष्ट था कि बच्चे की पढ़ाई और देखभाल में कोई लापरवाही नहीं बरती जा रही है। सुनवाई के दौरान पिता ने अपनी दूसरी शादी की बात भी स्वीकार की।
बच्चे का हित माता-पिता के अधिकारों से ऊपर
हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी तय करते समय माता-पिता के व्यक्तिगत अधिकारों से ज्यादा बच्चे का हित और कल्याण महत्वपूर्ण है। केवल पिता का सरकारी शिक्षक होना या बेहतर शिक्षा देने की क्षमता रखना कस्टडी बदलने का पर्याप्त आधार नहीं है। जब बच्चा मां के साथ सुरक्षित और बेहतर माहौल में रह रहा है, तो उसे वहां से हटाना उसके हित में नहीं होगा।
अदालत ने गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 17 और हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 13 के प्रावधानों का भी उल्लेख किया। इन कानूनों में बच्चे की उम्र, शिक्षा, देखभाल और समग्र कल्याण को कस्टडी तय करने का प्रमुख आधार माना गया है। सुप्रीम कोर्ट भी नील रतन कुंडू विरुद्ध अभिजीत कुंडू मामले में स्पष्ट कर चुका है कि बच्चे का हित माता-पिता के कानूनी अधिकारों से ऊपर है।