नई दिल्ली। 2,000 रुपए से अधिक के UPI लेनदेन पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लागू किए जाने के फैसले का व्यापारिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। शुल्क के खिलाफ बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि MDR शुल्क व्यापारियों पर थोपा गया है और इससे Payment and Settlement Systems Act, 2007 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी सुनवाई की तारीख तय नहीं की है।

देश के प्रमुख व्यापारिक संगठन Confederation of All India Traders (CAIT) ने भी केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र लिखकर शुल्क वापस लेने की मांग की है। CAIT का कहना है कि कपड़ा, किराना और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कारोबार में व्यापारियों का नेट प्रॉफिट मार्जिन 0.5% से 1% तक ही रहता है। ऐसे में 0.4% MDR शुल्क लगने से उनके मुनाफे का बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा। संगठन ने शुल्क-मुक्त UPI लेनदेन की सीमा 10,000 या 25,000 रुपए तक करने की मांग की है।

दिल्ली के व्यापारी संगठनों ने भी चेतावनी दी है कि यदि MDR शुल्क वापस नहीं लिया गया तो वे बड़े भुगतान के लिए UPI के बजाय नकद या चेक का इस्तेमाल करने पर विचार करेंगे। व्यापारियों का कहना है कि अतिरिक्त शुल्क से डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की दिशा में किए गए प्रयासों पर भी असर पड़ सकता है।

MDR पर 18% GST का भी प्रावधान

AMRG Global के मैनेजिंग पार्टनर रजन मोहन के मुताबिक MDR एक पेमेंट सेटलमेंट सर्विस है, इसलिए इस शुल्क पर 18% GST भी लागू होगा, जिसका भुगतान व्यापारी को करना होगा। हालांकि GST पंजीकृत व्यापारी बाद में इसे इनपुट टैक्स क्रेडिट के रूप में क्लेम कर सकते हैं।

सरकार ने कहा- फैसला 2020 में ही हो चुका था

MDR शुल्क को लेकर उठ रहे विरोध के बीच सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के मुताबिक इस पर 2020 में ही विचार किया जा चुका था और अब इसे वापस लेने का सवाल नहीं है। सरकार ने यह भी कहा है कि UPI से जुड़े नीतिगत फैसले स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं और MDR लागू करने का निर्णय किसी अमेरिकी दबाव में नहीं लिया गया।

सरकार की ओर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी की UPI शुल्क को लेकर की गई आलोचना पर भी सवाल उठाए गए हैं। अधिकारी ने बताया कि 12 अगस्त को संसद में पेश वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट में MDR शुल्क लागू करने की सिफारिश की गई थी। समिति ने इसे बिना देरी लागू करने की बात कही थी। समिति में कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ भी शामिल हैं।