जिले कि शिक्षा व्यवस्था प्रेमनगर की शिक्षाकर्मी भर्ती तक विवादों की चर्चा; रामानुजनगर में शिक्षिक के खिलाफ शिकायत और नशे में शिक्षकों के वायरल वीडियो पर भी जवाबदेही की मांग तेज,,,


राजधानी रिपोर्टर/सौरभ साहू कि विशेष रिपोर्ट,,,

दिनांक 28/10/2026

लोकेशन, प्रेमनगर जिला सूरजपुर छत्तीसगढ़।।


सूरजपुर | दिनांक 28 अक्टूबर 2026 को जिले के प्रेमनगर से एक मामला सामने आया है जो कि आज के बच्चों का उज्वल भविष्य अंधकारमय क्यों क्या हमारे जिले के गरीबों, मजदूर , किसानों के बच्चों,को मुफ्त शिक्षा व्यवस्था किसी भी समाज और देश के भविष्य की नींव होती है। विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे केवल किताबों से ज्ञान नहीं लेते, बल्कि अपने शिक्षकों के आचरण, अनुशासन और व्यवहार से भी जीवन की सीख हासिल करते हैं। लेकिन जब इसी शिक्षा व्यवस्था में भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठें, प्रवेश को लेकर शिकायतें सामने आएं, किसी शिक्षक के विरुद्ध कथित शिकायत के बावजूद बहाली के आदेश की चर्चा हो और शिक्षकों के नशे की हालत में होने के दावे वाले वीडियो वायरल होने की बात सामने आए, तो व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सूरजपुर जिले में अलग-अलग मामलों को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल किसी एक विद्यालय, एक शिक्षक या एक भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गए हैं। जवाहर नवोदय विद्यालय में प्रवेश से संबंधित कथित अनियमितताओं, पीएमश्री प्रयास विद्यालय के प्रवेश को लेकर उठे सवाल, प्रेमनगर विकासखंड में वर्ष 2007-08 की शिक्षाकर्मी वर्ग-3 भर्ती के तहत पांच शिक्षकों की नियुक्तियों की जांच की मांग और रामानुजनगर क्षेत्र की एक शिक्षिका से जुड़े कथित शिकायत प्रकरण को लेकर निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग महत्वपूर्ण होती जा रही है। इन मामलों की वास्तविक स्थिति अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इनसे जुड़े सवालों का निष्पक्ष निराकरण जरूरी है। आखिर शिकायतों पर विभागीय कार्रवाई किस स्तर तक पहुंची? जांच के निष्कर्ष क्या हैं? और यदि किसी मामले में नियमों का उल्लंघन प्रमाणित हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए हैं?

 प्रेमनगर की पुरानी भर्ती पर सवाल, पांच नियुक्तियों की जांच की मांग 


सूरजपुर जिले के प्रेमनगर विकासखंड में वर्ष 2007 और 2008 में हुई शिक्षाकर्मी वर्ग-3 की भर्ती को लेकर पांच शिक्षकों की नियुक्तियों पर सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में संगीता, विजय कुमार, कोमलिका तिर्की, श्रवण बघेल और देवनारायण सिंह की नियुक्तियों का उल्लेख करते हुए अनुभव प्रमाण पत्र, अंकसूची और अन्य दस्तावेजों की जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान निर्धारित नियमों के पालन और संबंधित दस्तावेजों के सत्यापन की पड़ताल होनी चाहिए। करीब दो दशक पुराने इस मामले में भर्ती विज्ञापन, पात्रता के मापदंड, चयन सूची, मेरिट सूची, नियुक्ति आदेश और मूल दस्तावेजों की जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। अब सवाल यह है कि क्या संबंधित विभाग इन नियुक्तियों के अभिलेखों की निष्पक्ष जांच कराएगा? यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में साक्ष्य हैं, तो उनकी जांच कर तथ्य सामने लाए जाएंगे या मामला केवल शिकायत तक सीमित रह जाएगा? यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इस प्रकरण में अब तक कोई औपचारिक जांच शुरू हुई है या नहीं।।


 रामानुजनगर की शिक्षिक से जुड़ा मामला: शिकायत के बाद बहाली कैसे? 


सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार कथित तौर पर रामानुजनगर क्षेत्र में विगत महिनों पहले फर्जी कागजात तैयार कर एक शिक्षिक के नौकरी के विरुद्ध कथित रूप से शिकायत दर्ज होने के बावजूद बहाली का आदेश जारी होने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इस प्रकरण में शिकायत की प्रति, पुलिस की वर्तमान स्थिति, विभागीय जांच रिपोर्ट और बहाली आदेश का सत्यापित विवरण सामने आना आवश्यक है। इस पूरे मामले अब जानना यह दिलचस्प होगा कि यदि वास्तव में शिकायत दर्ज कराई गई थी। और उसके बाद संबंधित शिक्षिक की बहाली की गई, तो यह जानना जरूरी होगा कि बहाली किन नियमों और तथ्यों के आधार पर की गई। क्या विभागीय जांच पूरी हुई थी? क्या शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच की गई? क्या सक्षम अधिकारी ने सभी उपलब्ध दस्तावेजों और संबंधित पक्षों का पक्ष सुनने के बाद आदेश जारी किया? यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि थाने में शिकायत दर्ज होना अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करता। इसी तरह, शिकायत दर्ज होने मात्र से बहाली अपने आप अवैध नहीं हो जाती। वास्तविक स्थिति संबंधित आदेश, लागू नियमों और जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगी। इसलिए इस मामले में आरोपों और प्रशासनिक निर्णयों की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है।


 नशे की हालत में शिक्षकों के कथित वायरल वीडियो पर कार्रवाई का हिसाब कौन देगा? 


शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक अन्य गंभीर सवाल उन शिक्षकों को लेकर है, जिनके कथित तौर पर शराब के नशे में होने के वीडियो वायरल होने की चर्चा सामने आई थी। यदि ऐसे वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि हुई है और संबंधित शिक्षकों के आचरण को लेकर विभाग को शिकायतें मिली हैं, तो यह जानना जरूरी है कि मामले में क्या कार्रवाई की गई। क्या संबंधित शिक्षकों के खिलाफ विभागीय जांच हुई? क्या उन्हें निलंबित किया गया? क्या उनका स्थानांतरण किया गया? यदि निलंबन के बाद बहाली हुई, तो किन परिस्थितियों और नियमों के तहत हुई? क्या जांच में आरोप प्रमाणित हुए थे या नहीं? इन सभी सवालों पर विभाग को तथ्यात्मक जानकारी देनी चाहिए।

केवल स्थानांतरण या कुछ समय के निलंबन को कार्रवाई का अंतिम परिणाम मान लेना पर्याप्त नहीं है। किसी भी मामले में कार्रवाई की उचितता इस बात पर निर्भर करती है कि आरोपों की जांच हुई या नहीं, निष्कर्ष क्या निकले और लागू नियमों के अनुसार आगे क्या कदम उठाए गए। बिना जांच के किसी शिक्षक को दोषी बताना उचित नहीं होगा, लेकिन प्रमाणित कदाचार पर नियमों के अनुरूप कार्रवाई होना भी आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विद्यार्थियों के हित और विद्यालयों का शैक्षणिक वातावरण सर्वोपरि होना चाहिए। यदि किसी शिक्षक के व्यवहार से बच्चों की सुरक्षा, अनुशासन या पढ़ाई प्रभावित होने की शिकायत है, तो विभाग को उसका गंभीरता से परीक्षण करना चाहिए। विद्यार्थियों और अभिभावकों की शिकायतें सुनने के लिए भी उचित व्यवस्था होनी चाहिए।


 बहाली के आदेशों और कथित सिफारिशों पर भी उठें सवाल 


कुछ सूत्रों के हवाले से यह दावा भी किया जा रहा है कि कुछ निलंबित शिक्षकों की बहाली में सिफारिशों या कथित लेनदेन की भूमिका रही हो सकती है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि करने वाले दस्तावेज या आधिकारिक निष्कर्ष उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।। यदि इस संबंध में कोई ठोस शिकायत, दस्तावेज, आदेश या अन्य साक्ष्य मौजूद हैं, तो सक्षम प्राधिकारी को उनकी जांच करानी चाहिए। बहाली के प्रत्येक आदेश का आधार, संबंधित जांच की स्थिति और निर्णय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। यदि किसी प्रकार के अनुचित दबाव, पक्षपात या भ्रष्टाचार के साक्ष्य मिलते हैं, तो नियमानुसार जांच और कार्रवाई की जानी चाहिए।

सरकारी व्यवस्था में सिफारिश या किसी व्यक्ति की पहचान से अधिक महत्व नियमों और साक्ष्यों का होना चाहिए। यही सिद्धांत शिक्षा विभाग के निर्णयों पर भी लागू होता है।


 क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने बच्चों के हितों की समीक्षा की? 


इन मामलों के बीच यह सवाल भी उठता है कि संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों ने विद्यालयों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए क्या कदम उठाए हैं। क्या उन्होंने विद्यार्थियों और अभिभावकों से बातचीत की? क्या विद्यालयों में अनुशासन, शिक्षकों की उपस्थिति और पढ़ाई की गुणवत्ता की समीक्षा की गई? क्या शिकायतों के निराकरण की स्थिति की नियमित निगरानी की जा रही है? यदि किसी विद्यालय में शिक्षक के आचरण या नियुक्ति को लेकर गंभीर शिकायत है, तो उसकी समीक्षा केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। विद्यार्थियों की पढ़ाई, उनके अधिकार और विद्यालय के वातावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को भी समझना जरूरी है।

हालांकि, किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी की निष्क्रियता का निष्कर्ष निकालने से पहले उनके द्वारा की गई कार्रवाई और उपलब्ध रिकॉर्ड की जानकारी लेना आवश्यक है। इसलिए संबंधित विभागों को अपनी कार्रवाई और जांच की स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए।


 क्या शिकायतों के बाद और लोग सामने आएंगे? 


इन प्रकरणों पर निष्पक्ष कार्रवाई होती है या नहीं, इसका असर भविष्य में शिकायत करने वाले लोगों के भरोसे पर भी पड़ सकता है। यदि शिकायतकर्ताओं को समयबद्ध सुनवाई और दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय मिलता है, तो अन्य प्रभावित लोग भी उचित माध्यम से अपनी बात रखने के लिए आगे आ सकते हैं। लेकिन यदि शिकायतों का निराकरण स्पष्ट कारणों और निष्कर्षों के बिना लंबित रहता है, तो लोगों के मन में व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा हो सकता है। इसलिए प्रशासन के लिए जरूरी है कि प्रत्येक मामले को उसके तथ्यों के आधार पर अलग-अलग जांचे और जहां कार्रवाई आवश्यक हो, वहां नियमों के अनुरूप कदम उठाए।


 प्रशासन के सामने अब सीधे सवाल 


सूरजपुर जिले की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े इन मामलों में अब संबंधित विभाग और जिला प्रशासन को कई महत्वपूर्ण सवालों का जवाब देना चाहिए—


- प्रेमनगर की पांच नियुक्तियों को लेकर प्राप्त शिकायत पर क्या जांच शुरू की गई है?

- नवोदय विद्यालय और पीएमश्री प्रयास विद्यालय के प्रवेश से संबंधित शिकायतों की वर्तमान स्थिति क्या है?

- रामानुजनगर की शिक्षिका के मामले में कथित पुलिस शिकायत और बहाली आदेश का आधार क्या था?

- कथित तौर पर नशे की हालत में वायरल वीडियो वाले शिक्षकों के मामलों में क्या विभागीय जांच और कार्रवाई हुई?

- जिन शिक्षकों को निलंबन के बाद बहाल किया गया, उनके बहाली आदेशों में क्या आधार दर्ज हैं?

- क्या संबंधित विद्यालयों में विद्यार्थियों और अभिभावकों की शिकायतों को सुनने तथा शैक्षणिक वातावरण की समीक्षा करने की व्यवस्था है?

इन सवालों का जवाब किसी अनुमान या आरोप से नहीं, बल्कि आधिकारिक रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के स्पष्ट पक्ष से सामने आना चाहिए।


 निष्कर्ष: शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही जरूरी, कार्रवाई तथ्यों के आधार पर हो। 


शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल विद्यालय चलाना या नियुक्तियां करना नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित वातावरण में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है। इसलिए भर्ती प्रक्रिया, प्रवेश व्यवस्था, शिक्षक आचरण और विभागीय कार्रवाई से जुड़ी शिकायतों को गंभीरता से लेना जरूरी है। सूरजपुर जिले से सामने आए इन अलग-अलग प्रकरणों की निष्पक्ष जांच, शिकायतों की वर्तमान स्थिति का खुलासा और विभागीय निर्णयों की पारदर्शिता अब महत्वपूर्ण है। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो संबंधित व्यक्तियों को भी स्पष्टता और न्याय मिलना चाहिए।

 अब बड़ा सवाल यही है —क्या इन मामलों में प्रशासन तथ्यात्मक जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाएगा, या शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल जवाब की प्रतीक्षा में ही रह जाएंगे? जिले के विद्यार्थियों, अभिभावकों और आम नागरिकों को इस सवाल का स्पष्ट और भरोसेमंद जवाब मिलना चाहिए।