भाई और पिता पर हत्या की साजिश रचने का आरोप, लेकिन अदालत में साबित नहीं कर पाई पुलिस; 13 गोलियों से लेकर 15 घंटे बाद हुए ईसीजी तक जांच में मिलीं गंभीर खामियां
बिलासपुर। कांग्रेस नेता और हिस्ट्रीशीटर संजू त्रिपाठी की दिनदहाड़े हुई हत्या के मामले में अदालत के फैसले ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब तक नहीं मिला है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर संजू त्रिपाठी की हत्या किसने की? अगर पुलिस के आरोपों के मुताबिक हत्या उसके भाई कपिल त्रिपाठी, पिता जयनारायण त्रिपाठी और अन्य लोगों ने नहीं की, तो फिर उसे किसने मारा? क्या संजू त्रिपाठी की हत्या हुई ही नहीं थी? अगर हत्या हुई थी, तो हत्यारे कौन थे और उनके पीछे कौन था? 14 दिसंबर 2022 को सकरी बाइपास पर दिनदहाड़े गोलियों से छलनी हुए संजू की मौत के करीब चार साल बाद भी इन सवालों का जवाब नहीं मिलना पुलिस की पूरी जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिस ने हत्या के पीछे पारिवारिक संपत्ति विवाद को मुख्य वजह बताया था। आरोप था कि छोटे भाई कपिल त्रिपाठी ने अपने पिता जयनारायण त्रिपाठी और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची तथा उत्तर प्रदेश के शूटरों को सुपारी देकर संजू को रास्ते से हटाया। पुलिस ने इस मामले में कुल 24 लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें 22 गिरफ्तार हुए, जबकि दो फरार बताए गए। शुक्रवार को अतिरिक्त दशम सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत ने करीब 350 पन्नों के फैसले में अभियोजन पक्ष के आरोपों को प्रमाणित नहीं मानते हुए सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया।
भाई और पिता पर आरोप, लेकिन अदालत में नहीं टिके सबूत
इस हत्याकांड का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि पुलिस की कहानी में मृतक के अपने भाई कपिल त्रिपाठी और पिता जयनारायण त्रिपाठी को ही हत्या की साजिश में शामिल बताया गया था। यानी जिस परिवार के भीतर संपत्ति विवाद को हत्या की वजह बताया गया, उसी परिवार के सदस्यों पर हत्या की योजना बनाने का आरोप था। लेकिन पुलिस अदालत में यह साबित नहीं कर पाई कि वास्तव में संपत्ति विवाद था भी या नहीं और यदि था तो उसका हत्या से क्या संबंध था।
यहां सवाल सिर्फ आरोपियों के बरी होने का नहीं है। सवाल यह भी है कि पुलिस ने जिन लोगों को हत्या का मुख्य साजिशकर्ता बताया, उनके खिलाफ ऐसी कौन सी ठोस परिस्थितियां और साक्ष्य थे, जिनके आधार पर उन्हें आरोपी बनाया गया? जब अदालत में ये कड़ियां ही नहीं जुड़ पाईं तो जांच की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
13 गोलियों का दावा, लेकिन कार पर निशान तक नहीं
अदालत के फैसले में जांच की कई ऐसी कमियां सामने आई हैं, जिन्होंने अभियोजन के पूरे मामले को कमजोर कर दिया। पुलिस ने आरोप पत्र में संजू की कार पर 13 गोलियां चलने का दावा किया था, लेकिन जांच में कार पर उतनी गोलियों के निशान नहीं मिले। कार के भीतर से भी गोलियां बरामद नहीं हुईं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर से तीन गोलियां निकलने का उल्लेख था, जबकि पुलिस ने दाह संस्कार के बाद छह छर्रे मिलने का दावा किया। इन दोनों तथ्यों के बीच का अंतर भी पुलिस स्पष्ट नहीं कर सकी।
इससे भी अधिक हैरान करने वाली बात यह रही कि पुलिस ने मर्ग में संजू की मौत का समय शाम 4.15 बजे दर्ज किया, जबकि अपोलो अस्पताल में करीब 15 घंटे बाद ईसीजी और एक्सरे किए जाने का उल्लेख मिला। इस दौरान शव कहां रखा गया था और इतनी देर बाद इन जांचों की आवश्यकता क्यों पड़ी, इन सवालों का संतोषजनक जवाब अभियोजन पक्ष नहीं दे पाया।
चश्मदीद मुकर गए, डिजिटल साक्ष्य भी अधूरे
पुलिस ने अदालत में 56 गवाहों के बयान और 265 दस्तावेज पेश किए थे। लेकिन घटनास्थल पर मौजूद पान ठेला संचालक सहित निजी गवाह अपने बयानों से मुकर गए। हत्या जैसी गंभीर वारदात में चश्मदीद गवाहों का साथ छोड़ देना अभियोजन के लिए बड़ा झटका साबित हुआ।
इसके अलावा मोबाइल लोकेशन और कॉल डिटेल निकालने वाले नोडल अधिकारियों के बयान अदालत में पेश नहीं किए गए। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को प्रमाणित करने के लिए जरूरी 65बी प्रमाणपत्र भी नहीं दिया गया। पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि हत्या की साजिश में किसकी क्या भूमिका थी और आरोपी एक-दूसरे से किस तरह जुड़े हुए थे।
अब पुलिस की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले में आरोपियों के बरी होने के बाद सवाल सिर्फ अभियोजन की नाकामी तक सीमित नहीं रह गए हैं। जांच के दौरान हुई एक के बाद एक चूक ने पुलिस की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। आखिर इतनी बड़ी और चर्चित हत्या के मामले में जांच अधिकारियों से इतनी बुनियादी गलतियां कैसे हुईं? 13 गोलियों का दावा करने से पहले घटनास्थल और कार से मिले साक्ष्यों का मिलान क्यों नहीं किया गया? पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस के दावों में अंतर क्यों रहा? इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को कानूनी रूप से प्रमाणित करने की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं की गई? निजी गवाहों के मुकरने की स्थिति क्यों बनी?
ये ऐसी कमियां हैं, जिन्हें सामान्य तकनीकी त्रुटियां कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि जांच में लापरवाही या त्रुटियों का सामने आना अपने आप में पुलिस और आरोपियों के बीच मिलीभगत साबित नहीं करता, लेकिन इतने गंभीर मामले में इन चूकों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि ये गलतियां महज लापरवाही थीं या इनके पीछे कोई दूसरी वजह थी।
एसएसपी ने माना, जांच में हुई गलतियों पर होगी कार्रवाई
फैसले के बाद एसएसपी रजनेश सिंह ने कहा है कि फैसले का विस्तृत अध्ययन कर नियमानुसार हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। जांच में जिन कर्मचारियों और अधिकारियों की लापरवाही या त्रुटियां सामने आई हैं, उनके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में एसआई सागर पाठक मुख्य विवेचक थे। इसके अलावा एफआईआर, मर्ग पंचनामा, कॉल डिटेल और घटनास्थल के निरीक्षण से जुड़े पुलिसकर्मियों की भी भूमिका रही थी।
सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित
संजू त्रिपाठी की हत्या के मामले में 22 आरोपियों के बरी होने से एक आपराधिक मुकदमे का फैसला तो हो गया, लेकिन हत्या की गुत्थी नहीं सुलझी। संजू की हत्या किसने की, किसने गोलियां चलाईं, किसने साजिश रची और हत्या के पीछे वास्तविक वजह क्या थी? ये सवाल आज भी कायम हैं।
अगर पुलिस की ओर से बताई गई हत्या की कहानी अदालत में साबित नहीं हुई तो अब पुलिस को अपनी जांच की खामियों का जवाब देने के साथ ही हत्या की वास्तविक सच्चाई भी सामने लानी होगी। आखिर एक व्यक्ति की दिनदहाड़े हत्या हुई, गोलियां चलीं, शव मिला और पोस्टमार्टम भी हुआ। फिर उसके हत्यारे कौन हैं?
संजू त्रिपाठी की हत्या का रहस्य अब भी बरकरार है। अदालत से 22 आरोपियों को राहत मिल गई, लेकिन संजू को न्याय कब मिलेगा और उसके हत्यारे कौन हैं, इसका जवाब अब भी पुलिस के पास नहीं है।