
1500 पन्नों का चालान भी नहीं आया काम, चश्मदीद गवाह आरोपियों को पहचान नहीं सके; पंचनामा और तस्वीरों में भी मिला अंतर
बिलासपुर। कांग्रेस नेता और हिस्ट्रीशीटर संजू उर्फ प्राणनाथ त्रिपाठी हत्याकांड में सभी 22 आरोपियों को बरी किए जाने के बाद पुलिस की जांच में रही गंभीर खामियां सामने आई हैं। अदालत ने माना कि संजू त्रिपाठी की मौत गोली लगने से हुई थी, लेकिन अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि गोली किसने चलाई और हत्या की साजिश में कौन-कौन शामिल था। हैरानी की बात यह है कि गोली से हत्या होने के बावजूद जब्त पिस्टलों और घटनास्थल से मिले खोखों की बैलिस्टिक जांच तक नहीं कराई गई।
मामले में पुलिस ने करीब 1500 पन्नों का चालान पेश किया था, लेकिन इतने बड़े दस्तावेजी रिकॉर्ड के बावजूद हत्या की साजिश और आरोपियों के बीच आपसी कड़ियां स्थापित नहीं हो सकीं। पुलिस के बताए चश्मदीद गवाह अदालत में आरोपियों की पहचान नहीं कर पाए। एक मामले में तो पुलिस का गवाह अदालत में जिस व्यक्ति को आरोपी प्रशीन गुप्ता बता रहा था, उसने अपना नाम अमन गुप्ता उर्फ सोनू बताया। इससे अभियोजन की पहचान संबंधी दलील कमजोर पड़ गई।
जांच में डिजिटल साक्ष्यों को लेकर भी गंभीर कमियां सामने आईं। सीसीटीवी फुटेज, पेन ड्राइव और मोबाइल रिकॉर्डिंग की प्रमाणिकता तथा सुरक्षित रखरखाव साबित नहीं किया जा सका। टेलीकॉम कंपनियों से प्राप्त कॉल डिटेल रिकॉर्ड के लिए जरूरी प्रमाण पत्र भी नहीं लिया गया। सीसीटीवी के आधार पर आरोपियों की पहचान का दावा किया गया, लेकिन पहचान परेड नहीं कराई गई।
पंचनामा और तस्वीरों में भी अंतर
घटनास्थल के पंचनामे में कार की आगे की विंडस्क्रीन टूटी होने का उल्लेख किया गया था, जबकि तस्वीरों में आगे का शीशा टूटा हुआ नहीं दिखा। कार के पीछे के हिस्से की स्थिति को लेकर भी अंतर सामने आया। घटनास्थल के नक्शे, स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी और वाहनों के नंबरों से संबंधित विवरण में भी विसंगतियां पाई गईं। जब्त मोबाइल और अन्य सामान की मालखाने में सुरक्षित कस्टडी का रिकॉर्ड भी पर्याप्त रूप से पेश नहीं किया गया।![]()
9 पुलिसकर्मियों और विशेषज्ञों की भूमिका पर सवाल
इस मामले में जांच अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और विशेषज्ञों की भूमिका पर अदालत में सवाल उठे। तत्कालीन थाना प्रभारी सकरी एवं विवेचक सागर पाठक हथियारों की बैलिस्टिक जांच नहीं करा सके। दो कथित चश्मदीद गवाह भी अदालत में घटना देखने और आरोपियों की पहचान करने से मुकर गए। डिजिटल साक्ष्यों की प्रमाणिकता और सीडीआर से जुड़े जरूरी दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए जा सके।
साइबर सेल के एसआई प्रभाकर तिवारी ने टेलीकॉम कंपनियों के अधिकृत अधिकारियों से प्रमाण पत्र लेने के बजाय खुद धारा 65बी का प्रमाण पत्र जारी किया। आरोपियों की आवाज पहचानने का दावा किया गया, लेकिन वॉयस सैंपल की फॉरेंसिक जांच नहीं कराई गई। दूसरे लोगों के नाम पर दर्ज सिम कार्ड के रिकॉर्ड में आरोपियों के नाम जोड़ने को लेकर भी सवाल उठे।
सिम्स के फॉरेंसिक विभाग के डॉ. राहुल अग्रवाल की रिपोर्ट को लेकर भी अदालत ने कमियां रेखांकित कीं। गोली के घावों के आसपास की त्वचा सुरक्षित नहीं रखी गई, जिससे गोली चलने की दूरी का वैज्ञानिक परीक्षण प्रभावित हुआ। पोस्टमार्टम में एक्स-रे फिल्मों और गोलियों के आंतरिक ट्रैक का पर्याप्त विवरण नहीं था। इलाज से जुड़े जरूरी दस्तावेज और मृत्यु प्रमाण पत्र भी रिकॉर्ड में शामिल नहीं किए गए।
शस्त्रागार के आर्मरर अशोक कुमार सिंह ने हथियारों की सामान्य जांच की थी, लेकिन वे बैलिस्टिक विशेषज्ञ नहीं थे। वे यह साबित नहीं कर सके कि घटनास्थल पर मिले खोखे और शरीर से निकली गोलियां जब्त पिस्टलों से ही चलाई गई थीं। उनकी रिपोर्ट में सील और कारतूसों की संख्या को लेकर भी विसंगतियां थीं।
अदालत में आरोपी की पहचान तक नहीं कर पाया पुलिस गवाह
अभियोजन गवाह कांस्टेबल दीपक उपाध्याय (PW-57) ने दावा किया था कि उसने उत्तर प्रदेश एटीएस कार्यालय में आरोपी प्रशीन गुप्ता से पूछताछ की थी और उसकी निशानदेही पर नोकिया मोबाइल बरामद कराया था। अदालत में जब उससे प्रशीन की पहचान करने को कहा गया तो उसने एक व्यक्ति की ओर इशारा किया। लेकिन उस व्यक्ति ने अपना नाम अमन गुप्ता उर्फ सोनू बताया। इस तरह पुलिस का गवाह अदालत में आरोपी की पहचान तक नहीं कर पाया।
एसआई हेमंत आदित्य ने घटना के करीब चार महीने बाद सार्वजनिक स्थान से चाकू बरामद कराया, लेकिन चाकू का हत्या या मृतक की चोटों से कोई वैज्ञानिक संबंध साबित नहीं हुआ। पुलिसकर्मी किशोर कुमार काले और जीवन साहू के मामले में पोस्टमार्टम के बाद कपड़ों और गोलियों की कस्टडी के दौरान चार दिन का अंतर मिला। इन चार दिनों का रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया। ड्यूटी सर्टिफिकेट में भी ओवरराइटिंग पाई गई।
इन तमाम कमियों के चलते अभियोजन पक्ष हत्या की साजिश और आरोपियों की संलिप्तता को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। नतीजतन, अदालत ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया। यह फैसला पुलिस विवेचना में वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने, डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और गवाहों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।