8 नवंबर को लक्ष्मी-गणेश पूजन का विशेष मुहूर्त शाम 5:45 से 7:45 बजे तक; श्री पीतांबरा पीठ त्रिदेव मंदिर में 8 एवं 9 नवंबर को होगा विशेष श्री सूक्त महाहवन


 पीतांबरा पीठ त्रिदेव मंदिर में विशेष श्री सूक्त महाहवन* 


दीपावली के पावन अवसर पर सुभाष चौक, सरकंडा स्थित श्री पीतांबरा पीठ त्रिदेव मंदिर में सर्वसमृद्धि एवं माँ महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए 8 एवं 9 नवंबर को विशेष श्री सूक्त महाहवन का आयोजन किया जाएगा।


पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने बताया कि इस वैदिक अनुष्ठान में ऋग्वेदोक्त श्री सूक्त के षोडश (16) मंत्रों का प्रत्येक दिन 108 बार प्रयोग करते हुए कुल 1,728 आहुतियाँ अर्पित की जाएँगी।

 श्री सूक्त के मंत्रों के साथ यज्ञ में आहुति देने से सुख-समृद्धि, धन-धान्य एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति की कामना की जाती है। यह अनुष्ठान व्यापार एवं कार्यक्षेत्र की बाधाओं से मुक्ति, मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी विशेष महत्व रखता है। वैदिक मंत्रोच्चार और हवन से वातावरण की शुद्धता एवं सकारात्मकता का भाव विकसित होता है। 


 सनातन धर्म में दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पाँच पर्वों की ऐसी दिव्य श्रृंखला है, जो भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक, सामाजिक एवं पारिवारिक मूल्यों को अपने भीतर समेटे हुए है। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक मनाया जाने वाला यह पंचपर्व धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा एवं भाई दूज के रूप में पाँच दिनों तक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। प्रत्येक पर्व जीवन को आरोग्य, समृद्धि, सकारात्मकता, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पारिवारिक सद्भाव का संदेश देता है।


 धनतेरस : आरोग्य एवं समृद्धि का पर्व (6 नवंबर, शुक्रवार) 

दीपावली पंचपर्व का शुभारंभ धनतेरस से होता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद एवं आरोग्य का देवता माना जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी एवं कुबेर की पूजा तथा यम दीपदान का विशेष महत्व है। नए बर्तन, सोने-चाँदी के आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है। यह पर्व संदेश देता है कि धन-संपत्ति के साथ उत्तम स्वास्थ्य ही जीवन की वास्तविक संपदा है।


 नरक चतुर्दशी : बुराई पर अच्छाई की विजय (7 नवंबर, शनिवार) 

छोटी दीपावली अथवा नरक चतुर्दशी भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध और उसके बंधन से 16,100 महिलाओं को मुक्त कराने की स्मृति में मनाई जाती है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व अभ्यंग स्नान एवं उबटन लगाने की परंपरा है, इसलिए इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। यह पर्व जीवन से नकारात्मकता, अहंकार और बुराइयों को दूर कर शुद्धता, सदाचार एवं सकारात्मकता अपनाने की प्रेरणा देता है।


 दीपावली : महालक्ष्मी-गणेश पूजन और प्रकाश का महापर्व (8 नवंबर, रविवार) 


कार्तिक अमावस्या को मनाई जाने वाली दीपावली भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या आगमन की स्मृति से जुड़ी है। मान्यता है कि उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप प्रज्वलित कर पूरी नगरी को प्रकाशमय कर दिया था। इसी दिन समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी के प्राकट्य की मान्यता भी प्रचलित है।


इस दिन संध्या बेला में माता महालक्ष्मी, भगवान गणेश एवं माँ सरस्वती का पूजन किया जाता है। माता लक्ष्मी धन एवं ऐश्वर्य, भगवान गणेश बुद्धि एवं मंगल तथा माँ सरस्वती ज्ञान एवं विवेक की अधिष्ठात्री हैं। इनकी आराधना से जीवन में सुख-समृद्धि, ज्ञान, विवेक और मंगल की कामना की जाती है।


 लक्ष्मी-गणेश पूजन का विशेष शुभ मुहूर्त 


रविवार, 8 नवंबर 2026 को गृहस्थों के लिए प्रदोष काल एवं स्थिर वृषभ लग्न में महालक्ष्मी पूजन विशेष शुभ माना गया है।

- मुख्य लक्ष्मी-गणेश पूजन मुहूर्त : शाम 5:45 से 7:45 बजे तक।

- प्रदोष काल : शाम 5:21 से 7:55 बजे तक।

- शुभ चौघड़िया : शाम 5:31 से 7:09 बजे तक।

- महानिशीथ काल : रात 11:38 से 12:30 बजे तक (9 नवंबर की मध्यरात्रि)।

- अमृत चौघड़िया : रात 1:42 से 3:21 बजे तक (9 नवंबर तड़के)।

- अमावस्या तिथि प्रारंभ : 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे।

- अमावस्या तिथि समाप्त : 9 नवंबर को दोपहर 12:31 बजे।


गृहस्थों के लिए प्रदोष काल एवं वृषभ स्थिर लग्न में पूजन का विशेष महत्व है, जबकि महानिशीथ काल में विशेष साधना एवं तांत्रिक परंपरा के उपासक आराधना करते हैं।


 

 गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट : प्रकृति और गौमाता के प्रति कृतज्ञता (10 नवंबर, मंगलवार)


गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला की स्मृति में मनाई जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप एवं मूसलाधार वर्षा से बचाने के लिए अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर गोवर्धन पर्वत धारण किया था। इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा कर भगवान श्रीकृष्ण को अन्नकूट एवं छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं। साथ ही गौमाता एवं प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के सम्मान और समस्त जीवों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है।


 भाई दूज : भाई-बहन के अटूट स्नेह का पर्व (11 नवंबर, बुधवार) 


दीपावली पंचपर्व का समापन भाई दूज अथवा यम द्वितीया से होता है। मान्यता है कि इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे। यमुना द्वारा किए गए सत्कार एवं तिलक से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया था। इसी परंपरा के अनुसार बहनें अपने भाइयों के माथे पर रोली एवं अक्षत का तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य एवं सुखमय जीवन की कामना करती हैं। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और पारिवारिक एकता का प्रतीक है।


इस प्रकार दीपावली के पाँचों पर्व जीवन के अलग-अलग पहलुओं को समृद्ध करते हैं। धनतेरस आरोग्य एवं समृद्धि, नरक चतुर्दशी बुराई पर अच्छाई की विजय, दीपावली ज्ञान एवं प्रकाश, गोवर्धन पूजा प्रकृति संरक्षण और भाई दूज पारिवारिक प्रेम एवं सद्भाव का संदेश देती है। वास्तव में दीपावली केवल दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के आध्यात्मिक दर्शन, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों का महापर्व है।