हाई कोर्ट ने पति की तलाक की अपील खारिज की, कहा- आरोपों को पुख्ता सबूत से साबित करना जरूरी
बिलासपुर। पति-पत्नी के बीच होने वाले सामान्य घरेलू विवाद, तीखी नोकझोंक या रंग-रूप को लेकर की गई साधारण टिप्पणियों को हर स्थिति में वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह जैसे बंधन को समाप्त करने के लिए केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि क्रूरता के आरोपों को कानून सम्मत और ठोस साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है।
जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने जांजगीर-चांपा फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पति की अपील खारिज कर दी। फैमिली कोर्ट ने 28 अगस्त 2024 को पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने इस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
2019 में हुआ था विवाह, बाद में शुरू हुए मतभेद
जांजगीर-चांपा निवासी दंपती का विवाह 7 मार्च 2019 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद शुरू हो गए। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की थी।
पति का आरोप था कि पत्नी उसे झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देती थी, उसकी अनुमति के बिना बाहर जाती थी और वैवाहिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के बजाय अलग रहने लगी थी। पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी उसके सांवले रंग और शारीरिक बनावट को लेकर उसे ताने देती थी। इसके अलावा उसने पत्नी के बिना पर्याप्त कारण अलग रहने को भी तलाक का आधार बताया।
वहीं पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि पति उसकी उपेक्षा करते थे। गर्भावस्था के दौरान उसे उचित चिकित्सकीय देखभाल और सहयोग नहीं मिला। स्वास्थ्य बिगड़ने पर उसकी मां उसे इलाज के लिए रायगढ़ ले गई थीं। इसके बाद पति या उसके परिजनों ने उसे वापस लाने का प्रयास नहीं किया। पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 के तहत अपना स्त्रीधन वापस दिलाने की भी मांग की थी।
फैमिली कोर्ट ने पत्नी को स्त्रीधन लौटाने का दिया था आदेश
जांजगीर फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी खारिज करने के साथ पत्नी के स्त्रीधन वापसी के आवेदन को स्वीकार किया था। कोर्ट ने एक माह के भीतर स्त्रीधन वापस करने का निर्देश दिया था। इस आदेश के खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
असहनीय और गंभीर आचरण होने पर ही क्रूरता
हाई कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य असहमतियों, घरेलू विवादों, तीखी प्रतिक्रियाओं या रंग-रूप को लेकर की गई साधारण टिप्पणियों को स्वतः क्रूरता नहीं माना जा सकता। क्रूरता तब मानी जा सकती है, जब संबंधित आचरण गंभीर, निरंतर और ऐसा हो जिससे वैवाहिक जीवन असहनीय हो जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाक के लिए लगाए गए आरोपों को ठोस और स्वीकार्य साक्ष्यों से साबित करना आवश्यक है।
इन्हीं आधारों पर डिवीजन बेंच ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।