महालया और शनि अमावस्या का विशेष संयोग, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त कर मांगी मोक्ष की कामना
बिलासपुर। पितरों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता का पर्व पितृपक्ष शनिवार को महालया यानी सर्वपितृ अमावस्या के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर बिलासपुर में अरपा नदी के छठ घाट सहित विभिन्न स्थानों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। लोगों ने सनातन परंपरा के अनुसार स्नान कर अपने दिवंगत परिजनों का स्मरण किया और विधि-विधान से तर्पण, श्राद्ध तथा पूजन-अर्चन कर उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना की। इस वर्ष पितृपक्ष का समापन शनि अमावस्या के दिन होने से भी इस तिथि का धार्मिक महत्व रहा।
पितृपक्ष हिंदू परंपरा में अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का विशेष अवसर माना जाता है। मान्यता है कि मनुष्य का जीवन केवल उसके अपने प्रयासों का परिणाम नहीं, बल्कि पूर्वजों के त्याग, संस्कारों और योगदान से भी जुड़ा होता है। इसी भाव के साथ पितृपक्ष के 15 दिनों में लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य पूर्वजों को याद करते हैं। उनकी स्मृति में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है तथा जरूरतमंदों को भोजन और दान देकर पुण्य अर्जित करने की परंपरा निभाई जाती है।
सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व
पितृपक्ष के अंतिम दिन को सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया, उनके निमित्त इस दिन श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है। इसी वजह से यह तिथि उन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के स्मरण और श्रद्धांजलि के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
तर्पण में जल, तिल और कुश आदि अर्पित कर पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। श्राद्ध के माध्यम से दिवंगत परिजनों का स्मरण करते हुए उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की जाती है। परिवार की परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधियों में अंतर हो सकता है, लेकिन इन सभी कर्मकांडों का मूल भाव पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता ही है।
पितृपक्ष के बाद शुरू होता है देवी पक्ष
महालया का संबंध केवल पितृपक्ष की समाप्ति से ही नहीं, बल्कि शारदीय नवरात्रि के आगमन से भी जुड़ा है। बंगाली परंपरा में महालया को मां दुर्गा के आगमन का संदेश देने वाला दिन माना जाता है। इसके साथ ही दुर्गा पूजा की तैयारियां तेज हो जाती हैं और देवी पक्ष का स्वागत किया जाता है। इस तरह महालया एक ओर पूर्वजों के स्मरण और श्रद्धांजलि का अवसर है, तो दूसरी ओर शक्ति उपासना के पर्व की शुरुआत का संकेत भी है।
पितृपक्ष का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि परिवार और समाज की जड़ों को सींचने वाले पूर्वजों को याद रखना हमारी सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। श्रद्धालुओं ने तर्पण और श्राद्ध के माध्यम से दिवंगत परिजनों के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कीं और उनके आशीर्वाद की कामना की।