पीयूष गंगवानी के खिलाफ दर्ज दोनों एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार, शिकायतकर्ता की एसएलपी खारिज
बिलासपुर। फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिए आपत्तिजनक फोटो प्रसारित करने की धमकी देने और ऑनलाइन महादेव सट्टा एप से जुड़े मामले में बिलासपुर के पीयूष गंगवानी को मिली राहत बरकरार रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिसमें पीयूष के खिलाफ दर्ज दोनों एफआईआर, उनसे संबंधित चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया गया था। हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए शिकायतकर्ता नरेंद्र कुमार मोटवानी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की थी। 8 अक्टूबर को सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई की। हाई कोर्ट ने 20 अगस्त 2025 को पीयूष गंगवानी के खिलाफ दोनों मामलों में दर्ज एफआईआर और उनसे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद हाई कोर्ट का यह फैसला बरकरार है।
महादेव सट्टा एप के लिए बैंक खाते खुलवाने का था आरोप
मामले की पहली एफआईआर तारबाहर थाने में दर्ज की गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि मई-जून 2022 के दौरान कुछ लोगों ने फर्जी कंपनी बनाकर ऑनलाइन महादेव सट्टा एप के संचालन के लिए बैंक खाते खुलवाए थे। इन खातों के इस्तेमाल के लिए ओटीपी हासिल करने और उनका उपयोग करने की बात भी सामने आई थी।
इस मामले में पीयूष गंगवानी का नाम बाद में एक सह-आरोपी के कथित बयान के आधार पर जोड़ा गया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने मामले के उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि पीयूष के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं थी। इसी आधार पर उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और संबंधित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया गया था।
फर्जी इंस्टाग्राम आईडी से आपत्तिजनक फोटो भेजने का दूसरा मामला
पीयूष के खिलाफ दूसरी एफआईआर फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट बनाकर आपत्तिजनक संदेश भेजने के मामले में दर्ज की गई थी। शिकायत के अनुसार, किसी अज्ञात व्यक्ति ने फर्जी इंस्टाग्राम आईडी बनाई और शिकायतकर्ता नरेंद्र कुमार मोटवानी के भतीजे के नाम से पहचान बनाकर आपत्तिजनक फोटो प्रसारित करने की धमकी वाले संदेश भेजे थे।
जांच के दौरान कथित आईपी एड्रेस के आधार पर पीयूष गंगवानी को आरोपी बनाया गया। हालांकि, हाई कोर्ट ने जांच में सामने आए तथ्यों और साइबर सेल की रिपोर्ट का परीक्षण करते हुए पाया कि पीयूष के खिलाफ आरोपों को समर्थन देने वाले पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।
मोबाइल में नहीं मिली संबंधित इंस्टाग्राम आईडी
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साइबर सेल की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया था। रिपोर्ट के मुताबिक, पीयूष गंगवानी के जब्त मोबाइल फोन में संबंधित इंस्टाग्राम आईडी नहीं मिली थी। मोबाइल से उस अकाउंट के संचालन का भी प्रमाण नहीं मिला।
हाई कोर्ट ने इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जांच की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे। अदालत ने माना था कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर पीयूष के खिलाफ दोनों मामलों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर दोनों एफआईआर, चार्जशीट और संबंधित आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार
हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाले नरेंद्र कुमार मोटवानी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका पेश की गई थी। 8 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए एसएलपी खारिज कर दी।
इस फैसले के साथ पीयूष गंगवानी को दोनों मामलों में हाई कोर्ट से मिली राहत बरकरार रही। हाई कोर्ट का आदेश उपलब्ध साक्ष्यों और जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर दिया गया था, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने उसे चुनौती देने वाली याचिका पर हस्तक्षेप नहीं किया।