जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं पर पूरा ध्यान, लेकिन खबरों के लिए मैदान में डटे पत्रकारों के बैठने तक की व्यवस्था नहीं; जिला प्रशासन और आयोजनकर्ताओं की कार्यशैली पर उठे सवाल


राजधानी रिपोर्टर/सौरभ साहू कि विशेष,रिपोर्ट 

दिनांक 14/10/2026

लोकेशन, सूरजपुर छत्तीसगढ़।।।


सूरजपुर/:-- सूरजपुर जिले में सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों के आयोजन के दौरान जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं को प्राथमिकता दिए जाने के बीच पत्रकारों की अनदेखी का मुद्दा गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। नेताओं के बैठने के लिए कुर्सियों की समुचित व्यवस्था की जाती है, लेकिन जनता तक खबर पहुंचाने के लिए मौके पर पहुंचे पत्रकारों के लिए बैठने तक की व्यवस्था नहीं होना आखिर किस तरह की कार्यशैली को दर्शाता है? क्या पत्रकारों की भूमिका केवल तस्वीरें खींचने, बाइट लेने और खबर प्रकाशित करने तक ही सीमित रह गई है?


जिला प्रशासन हो या कार्यक्रम के आयोजक, पत्रकारों को आमंत्रित कर उनसे बेहतर कवरेज की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन उनके लिए बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करने पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? क्या प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देना, कुछ तस्वीरें उपलब्ध करा देना और खबर प्रकाशित हो जाना ही जिम्मेदारी की इतिश्री मान ली गई है? यदि कार्यक्रमों में पत्रकारों की उपस्थिति इतनी महत्वपूर्ण है, तो उनके सम्मान और सुविधाओं को नजरअंदाज करने का औचित्य क्या है?


आज तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दौर में तस्वीरें तैयार करना और पोर्टल पर खबरें प्रकाशित करना पहले से आसान हो गया है, लेकिन वास्तविक पत्रकारिता केवल प्रेस विज्ञप्ति और उपलब्ध तस्वीरों तक सीमित नहीं है। मौके पर पहुंचकर घटनाक्रम को समझना, वास्तविक दृश्य जुटाना, संबंधित लोगों से बातचीत करना, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की बाइट लेना तथा तथ्यों की पुष्टि कर जनता तक सच्चाई पहुंचाना पत्रकारिता का मूल दायित्व है। इसी जिम्मेदारी को निभाने के लिए पत्रकार कार्यक्रम स्थल पर पहुंचते हैं और घंटों मेहनत कर समाचार संकलन करते हैं। इसके बावजूद यदि उन्हें बैठने जैसी सामान्य सुविधा के लिए भी असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़े, तो यह आयोजन व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करता है।


विडंबना यह है कि कार्यक्रमों में मंच, कुर्सियों और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करते समय जनप्रतिनिधियों की जरूरतों का ध्यान रखा जाता है, लेकिन उन्हीं कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाने वाले पत्रकारों की बुनियादी जरूरतें कई बार नजरअंदाज कर दी जाती हैं। कैमरा लेकर खड़े पत्रकारों से बेहतर कवरेज की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन उनकी सुविधा और सम्मान के प्रति जिम्मेदारी कौन निभाएगा? जब जनप्रतिनिधियों के लिए बैठने की पर्याप्त व्यवस्था की जा सकती है, तो पत्रकारों के लिए कुछ कुर्सियां उपलब्ध कराने में आखिर परेशानी क्या है?


लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक गतिविधियों और जनप्रतिनिधियों के कार्यों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ जनसमस्याओं, अव्यवस्थाओं और व्यवस्था की खामियों को भी सामने लाते हैं। उनकी भूमिका केवल किसी कार्यक्रम की उपलब्धियों का प्रचार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सवाल पूछना, तथ्यों को सामने लाना और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करना भी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण दायित्व है। ऐसे में पत्रकारों को केवल समाचार प्रकाशित करने के माध्यम के रूप में देखना और उनकी बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी करना उचित नहीं कहा जा सकता।


सवाल सीधा है, क्या पत्रकार केवल नेताओं की तस्वीरें खींचने, बाइट लेने और खबर प्रकाशित करने के लिए हैं? क्या उनकी मेहनत, समय और गरिमा का कोई महत्व नहीं है? यदि पत्रकारों से समय पर समाचार प्रकाशित करने और कार्यक्रमों की बेहतर कवरेज की अपेक्षा की जाती है, तो उनके लिए सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियां उपलब्ध कराने पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए। पत्रकारों का सम्मान केवल मंच से प्रशंसा करने या औपचारिक बातें कहने से नहीं, बल्कि उनके साथ किए जाने वाले व्यवहार और कार्यक्रम स्थल पर उपलब्ध कराई जाने वाली व्यवस्थाओं से भी प्रदर्शित होता है।


जिला प्रशासन और कार्यक्रम आयोजकों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। कार्यक्रमों की व्यवस्थाएं केवल मंच पर बैठे लोगों की सुविधाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन सभी लोगों की जरूरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए, जो अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए वहां मौजूद रहते हैं। पत्रकारों को आमंत्रित करने के साथ उनके लिए बैठने की उचित व्यवस्था, समाचार संकलन के लिए पर्याप्त स्थान और सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना भी बेहतर आयोजन का हिस्सा होना चाहिए।


सूरजपुर में उठ रहा यह सवाल किसी एक कुर्सी या बैठने की जगह तक सीमित नहीं है, बल्कि पत्रकारों के प्रति व्यवस्था की सोच और उनके काम के प्रति सम्मान से जुड़ा है। यदि पत्रकारों की मौजूदगी कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार और समाचारों के माध्यम से जनता तक जानकारी पहुंचाने के लिए जरूरी है, तो उनकी सुविधाओं की अनदेखी क्यों? आखिर सम्मान की अपेक्षा केवल पत्रकारों से ही क्यों की जाए, जबकि उनके सम्मान की जिम्मेदारी निभाना भी आयोजकों और प्रशासन का दायित्व है?


सम्मान केवल मंच पर बैठे नेताओं का नहीं, बल्कि मैदान में खड़े होकर जनता तक सच्चाई पहुंचाने वाले पत्रकारों का भी होना चाहिए। अब सवाल यह है कि पत्रकारों की मेहनत और जिम्मेदारी का सम्मान केवल भाषणों और औपचारिकताओं तक सीमित रहेगा या आने वाले कार्यक्रमों की व्यवस्थाओं में भी दिखाई देगा? जिला प्रशासन और आयोजनकर्ताओं को इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए, ताकि पत्रकारों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में असहज परिस्थितियों का सामना न करना पड़े और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रति सम्मान व्यवहार में भी दिखाई दे।