पांचवीं और दसवीं की अंकसूची से साबित हुई पीड़िता की उम्र, 2017 में आरोपी के कब्जे से हुई थी बरामदगी
बिलासपुर। नाबालिग को बहला-फुसलाकर भगाने और उसके साथ बार-बार दुष्कर्म करने के मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दोषी की अपील खारिज कर दी है। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने अंबिकापुर की विशेष पॉक्सो अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 17 साल 6 महीने थी। ऐसे में यदि वह शारीरिक संबंधों के लिए सहमत भी थी, तब भी उसकी सहमति का कानूनी महत्व नहीं है। हाई कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाते हुए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।
मामले के अनुसार, आरोपी पीड़िता का दूर का रिश्तेदार था और कुछ समय तक उसके परिवार के घर में रहा था। आरोप था कि इसी दौरान उसने पीड़िता को बहलाकर उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। परिवार को इसकी जानकारी मिलने पर आरोपी को घर से निकाल दिया गया। इसके बाद भी वह मोबाइल फोन के जरिए पीड़िता के संपर्क में रहा।
17 जनवरी 2017 को आरोपी शादी का झांसा देकर पीड़िता को अपने साथ ले गया। परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने अपहरण का मामला दर्ज किया। बाद में 29 जनवरी 2017 को पुलिस ने पीड़िता को आरोपी के कब्जे से बरामद किया। पीड़िता ने अपने बयान में आरोप लगाया कि आरोपी उसे अलग-अलग स्थानों पर ले गया और इस दौरान बार-बार दुष्कर्म किया। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और जान से मारने की धमकी भी दी गई।
पांचवीं और दसवीं की अंकसूची बनी उम्र का आधार
आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील के दौरान दलील दी कि पीड़िता के पहले स्कूल का मूल रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। उसने दोनों के बीच संबंधों को सहमति से बने संबंध बताते हुए गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने का दावा भी किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के पिता ने उसका स्कूल में दाखिला कराया था और जन्मतिथि 1 जुलाई 1999 दर्ज कराई थी। पांचवीं कक्षा के स्कूल रिकॉर्ड और दसवीं की अंकसूची, दोनों में यही जन्मतिथि दर्ज थी। दसवीं की अंकसूची छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, रायपुर की ओर से जारी की गई थी। हाई कोर्ट ने इन दस्तावेजों को पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए विश्वसनीय माना।
पीड़िता की गवाही को कोर्ट ने माना भरोसेमंद
हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के बयान की पुष्टि उसके माता-पिता, चाचा और जांच अधिकारी के बयानों से होती है। बचाव पक्ष की जिरह में ऐसा कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने नहीं आया, जिससे पीड़िता की गवाही पर संदेह किया जा सके। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी को पीड़िता की उम्र की जानकारी थी। घटना के समय उसके नाबालिग होने के कारण सहमति संबंधी दलील से आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती।
विशेष पॉक्सो अदालत ने सुनाई थी 10 साल की सजा
अंबिकापुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 3 अगस्त 2022 को आरोपी को तीन धाराओं में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। आईपीसी की धारा 363 के तहत 3 साल, धारा 366 के तहत 5 साल और धारा 376 (2) (n) के तहत 10 साल के कठोर कारावास की सजा दी गई थी। इसके साथ जुर्माना भी लगाया गया था। सभी सजाएं एक साथ चलाने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट ने अब अपील खारिज कर निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। आरोपी पहले से जेल में है।