
14 घंटे निर्जला रहकर सुहागिनों ने की पति की लंबी उम्र की कामना, कहीं चलनी से देखा चांद तो कहीं मोबाइल स्क्रीन पर किए दर्शन; प्रेम, विश्वास और समर्पण का पर्व बना सामाजिक एकजुटता का अवसर
बिलासपुर। करवा चौथ केवल चंद्रमा के दर्शन कर व्रत खोलने की धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, समर्पण और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी के भाव को मजबूत करने का पर्व भी है। गुरुवार को सुहागिनों ने पति की लंबी उम्र, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ करीब 14 घंटे निर्जला व्रत रखा। हालांकि दिनभर हुई बारिश और आसमान में छाए बादलों ने चांद के दीदार की राह मुश्किल कर दी। रात 8:53 बजे निर्धारित चंद्रोदय के समय के बाद भी शहर के कई इलाकों में चंद्रमा दिखाई नहीं दिया। इसके बावजूद महिलाओं का उत्साह कम नहीं हुआ। कहीं रिश्तेदारों को वीडियो कॉल कर चंद्रमा के दर्शन किए गए तो कहीं शास्त्रीय परंपरा के अनुसार चावल से चंद्रमा की आकृति बनाकर पूजा की गई। कुछ महिलाओं ने भगवान शिव के मस्तक पर विराजित चंद्रमा के दर्शन कर व्रत का पारण किया।
सुबह से ही महिलाओं ने निर्जला व्रत की शुरुआत कर दी थी। दिनभर घरों में पूजा की तैयारियां चलती रहीं। शाम होते ही कॉलोनियों और मंदिरों में महिलाओं ने सामूहिक रूप से गौरा-गौरी तथा शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना की। करवा चौथ की कथा सुनकर पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन में खुशहाली की कामना की। चौथ तिथि 29 अक्टूबर की रात 1:08 बजे से शुरू होने के साथ ही पर्व का धार्मिक क्रम आरंभ हो गया था।
बादलों के बीच तकनीक बनी चांद के दीदार का माध्यम
इस बार मौसम ने करवा चौथ की परंपरा के सामने एक अलग परिस्थिति पैदा कर दी। रात 8:53 बजे चंद्रोदय का समय होने के बावजूद कई जगह बादलों के कारण चंद्रमा दिखाई नहीं दिया। ऐसे में महिलाओं ने परंपरा और आस्था के बीच रास्ता निकालते हुए रिश्तेदारों को वीडियो कॉल किया। दूसरे शहरों में रहने वाले परिजनों के मोबाइल पर दिखाई दे रहे चंद्रमा के दर्शन कर पूजा की। जिन महिलाओं के पति नौकरी या अन्य कारणों से घर से दूर थे, उन्होंने भी वीडियो कॉल के माध्यम से पति का चेहरा देखकर व्रत पूरा किया। जहां चंद्रमा दिखाई दिया, वहां महिलाओं ने चलनी से पहले चंद्रमा और फिर पति का चेहरा देखकर अर्घ्य दिया और पारण किया।
आस्था के साथ जुड़ा पति-पत्नी के रिश्ते का भाव
करवा चौथ की मूल भावना पति की लंबी उम्र की कामना से जुड़ी है, लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह पर्व दांपत्य जीवन में परस्पर विश्वास, सम्मान, सहयोग और भावनात्मक जुड़ाव का संदेश भी देता है। बदलते समय में इस पर्व का स्वरूप भी व्यापक हुआ है। कई परिवारों में पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं और एक-दूसरे के स्वास्थ्य व खुशहाली की कामना करते हैं। इससे यह परंपरा केवल एक पक्ष के त्याग तक सीमित न रहकर आपसी प्रेम और साझेदारी का प्रतीक बन रही है।
पर्व के दौरान महिलाओं ने एक-दूसरे के साथ पूजा की तैयारियां साझा कीं, सुहाग सामग्री और करवे भेंट किए तथा बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया। कई घरों में करवा चौथ की कथा सुनकर परंपरागत रूप से उद्यापन भी किया गया। चंद्रमा की प्रतीक्षा के दौरान भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ। इस सामूहिकता ने त्योहार को धार्मिक आयोजन के साथ पारिवारिक और सामाजिक मिलन का अवसर भी बना दिया।
अविवाहित युवतियों ने भी रखा व्रत
करवा चौथ की परंपरा में अविवाहित युवतियों की भागीदारी भी देखने को मिली। उन्होंने अच्छे जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखकर पूजा-अर्चना की। भाग्यश्री, अहाना, जाह्नवी, राशिका, सुम्मी, रुचि, सृष्टि, सोनाली, प्रियंका, अंकिता, शेफाली और सुरभि सहित अनेक महिलाओं ने उत्साह और श्रद्धा के साथ पर्व मनाया।
इस बार बादलों ने भले ही चांद के दीदार में बाधा डाली, लेकिन महिलाओं की आस्था और उत्साह में कमी नहीं आई। किसी ने मोबाइल स्क्रीन पर चांद देखा तो किसी ने धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा पूरी की। अंततः करवा चौथ ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि त्योहारों की असली खूबसूरती केवल रस्मों में नहीं, बल्कि उन रिश्तों, भावनाओं और पारिवारिक जुड़ाव में है, जिन्हें ये परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी मजबूत करती हैं।