बिलासपुर। सनातन पर्वों को लेकर प्रशासनिक उदासीनता के आरोप समय-समय पर उठते रहे हैं, लेकिन गणेश विसर्जन के दौरान तोरवा के छठ घाट पर दिखाई दे रही तस्वीर इन आरोपों को और गंभीर बना रही है। एक ओर शहर में प्रथम पूज्य भगवान गणेश की प्रतिमाओं की स्थापना पूरे श्रद्धाभाव से की गई और दूसरी ओर अब जब श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए घाटों तक पहुंच रहे हैं, तब व्यवस्था के नाम पर उन्हें लगभग खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।
गणेश चतुर्थी के बाद एक, तीन, पांच, सात से लेकर 10 दिन तक भगवान गणेश की पूजा-अर्चना कर प्रतिमाओं के विसर्जन की परंपरा है। इसी क्रम में इन दिनों शहर के शिव घाट, पचरी घाट और तोरवा स्थित छठ घाट पर श्रद्धालु प्रतिमाएं लेकर पहुंच रहे हैं। प्रशासन की ओर से विसर्जन के लिए विशेष व्यवस्था किए जाने के दावे किए गए थे, लेकिन छठ घाट पर पहुंचने के बाद दावे और धरातल के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिलासपुर में तीन-तीन बराज होने के बावजूद गणेश विसर्जन के लिए नदी में पर्याप्त पानी क्यों नहीं है? छठ घाट पर नदी की मुख्य धारा घाट से काफी दूर सिमट गई है। जो पानी दिखाई दे रहा है, उसकी गहराई भी लगभग 1 फीट के आसपास ही नजर आती है। ऐसे में बड़ी गणेश प्रतिमाओं का विधिवत विसर्जन कैसे हो, यह सवाल श्रद्धालुओं के सामने खड़ा है।
श्रद्धालुओं को प्रतिमा और निर्माल्य लेकर घाट से काफी दूर नदी की पतली धारा तक जाना पड़ रहा है। वहां भी पर्याप्त गहराई नहीं होने के कारण विसर्जन की परंपरा महज औपचारिकता बनकर रह गई है। आस्था के साथ नदी तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के सामने अब यह विडंबना है कि विसर्जन करने के लिए घाट तो है, लेकिन विसर्जन के लिए पानी नहीं।
यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इस वर्ष अच्छी बारिश हुई है। इसके बावजूद गणेश विसर्जन के समय नदी का जलस्तर इतना कम होना सामान्य स्थिति नहीं माना जा सकता। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले वर्षों में गणेश विसर्जन के दौरान देवरीखुर्द स्थित चेक डैम के गेट बंद किए जाते थे, जिससे तोरवा छठ घाट की ओर नदी में पर्याप्त जलस्तर बना रहता था और श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से प्रतिमाओं का विसर्जन कर पाते थे। इस बार चेक डैम के गेट बंद नहीं किए जाने से नदी का पानी आगे निकल गया और घाट के आसपास पर्याप्त जलस्तर नहीं बन सका।
व्यवस्था की तस्वीर यहीं खत्म नहीं होती। श्रद्धालुओं ने घाट पर सुरक्षा, प्रकाश व्यवस्था और अन्य आवश्यक इंतजामों की कमी को लेकर भी नाराजगी जताई। विसर्जन के दौरान जिन स्थानों पर प्रशासन को पहले से तैयारी करनी चाहिए थी, वहां श्रद्धालुओं को स्वयं जोखिम उठाकर नदी की ओर जाना पड़ रहा है। इस बार गोताखोरों की व्यवस्था भी नजर नहीं आई। हालांकि वर्तमान जलस्तर को देखते हुए गोताखोरों की जरूरत भले कम दिखाई दे, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासन को विसर्जन स्थल की तैयारी जलस्तर देखकर करनी थी या श्रद्धालुओं की सुरक्षा और धार्मिक परंपरा को ध्यान में रखकर?
श्रद्धालुओं में इस अव्यवस्था को लेकर नाराजगी साफ दिखाई दी। उनका कहना था कि पर्वों के दौरान प्रशासन से किसी विशेष सुविधा की अपेक्षा नहीं होती, लेकिन कम से कम इतनी व्यवस्था तो होनी चाहिए कि लोग अपनी धार्मिक परंपरा सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से निभा सकें।
गणेश विसर्जन अभी समाप्त नहीं हुआ है। अनंत चतुर्दशी तक प्रतिमाओं के विसर्जन का सिलसिला जारी रहेगा। ऐसे में प्रशासन के पास अब भी समय है। यदि देवरीखुर्द चेक डैम के गेट बंद कर छठ घाट की ओर पर्याप्त जलस्तर सुनिश्चित किया जाए और घाट पर प्रकाश, सुरक्षा, बैरिकेडिंग तथा आवश्यक अन्य व्यवस्थाएं तत्काल की जाएं तो श्रद्धालुओं को हो रही परेशानी दूर की जा सकती है।
पर्व आते-जाते रहेंगे, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी हर बार बनी रहेगी। आस्था के सबसे बड़े पर्वों में से एक गणेश उत्सव में यदि श्रद्धालुओं को विसर्जन के लिए पानी तक उपलब्ध न कराया जा सके, तो यह केवल अव्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्न है। अभी समय है कि दावों और कागजी तैयारियों से आगे बढ़कर प्रशासन मौके पर पहुंचे, स्थिति देखे और अनंत चतुर्दशी से पहले छठ घाट को विसर्जन के योग्य बनाने की ठोस कार्रवाई करे।