
बिलासपुर। दीपावली पर जहां देश के अधिकांश हिस्सों में मां लक्ष्मी की आराधना की जाती है, वहीं पश्चिम बंगाल, असम सहित पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में कार्तिक अमावस्या की रात मां काली की पूजा की विशेष परंपरा है। इसे काली अमावस्या भी कहा जाता है। इसी परंपरा के तहत छत्तीसगढ़ बंगाली समाज की ओर से 8 नवंबर रविवार की रात तोरवा छठ घाट रोड स्थित बंगाली भवन में श्री श्री मां काली पूजा का आयोजन किया जाएगा। यहां मां काली की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी।
कौन हैं मां काली, क्यों होती है उनकी पूजा
हिंदू धर्म में मां काली को आदिशक्ति और मां दुर्गा का उग्र स्वरूप माना जाता है। देवी महात्म्य की कथा के अनुसार, असुरों के संहार के लिए मां दुर्गा के क्रोध से मां काली प्रकट हुई थीं। उन्होंने चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे शक्तिशाली असुरों का वध कर देवताओं को उनके आतंक से मुक्ति दिलाई। मां काली को अधर्म, अन्याय और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। उनका स्वरूप शक्ति, साहस और बुराई पर विजय का प्रतीक माना जाता है।
मान्यता है कि समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं, इसलिए दीपावली की रात धन, वैभव और समृद्धि की कामना के साथ मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। वहीं, बंगाल और असम सहित पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में इसी रात मां काली की आराधना की परंपरा है। काली पूजा में भक्त मां से भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
काली पूजा के दौरान मां की प्रतिमा स्थापित कर विशेष मंत्रों और विधि-विधान से आराधना की जाती है। भक्त पुष्पांजलि अर्पित करते हैं और भोग चढ़ाते हैं। कई स्थानों पर रात्रि में विशेष पूजा, दीप प्रज्वलन, भजन और सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं। मां काली को लाल गुड़हल के फूल विशेष प्रिय माने जाते हैं। पूजा में स्वच्छता, श्रद्धा और परंपरागत विधि का विशेष ध्यान रखा जाता है।
बंगाली भवन में तीन दिन होंगे धार्मिक आयोजन
छत्तीसगढ़ बंगाली समाज के प्रदेश अध्यक्ष एवं आयोजन समिति के पल्लव धर ने बताया कि 8 नवंबर की रात बंगाली भवन में मां काली की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। पुष्पांजलि के बाद श्रद्धालुओं को भोग वितरित किया जाएगा। आयोजन में हर वर्ष की तरह इस बार भी बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल, भाजपा जिला अध्यक्ष दीपक सिंह ठाकुर सहित शहर के कई विशिष्ट जन शामिल होंगे।
9 नवंबर सोमवार की सुबह दधी कर्म पूजा होगी। शाम को भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर भंडारा भी रखा गया है। तीन दिवसीय आयोजन के बाद 10 नवंबर मंगलवार को सुबह 11 बजे मां काली की प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा।