वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता का मजबूत कानूनी अनुमान, नॉन-एक्सेस का ठोस सबूत जरूरी
बिलासपुर। हाई कोर्ट ने बच्चे की वैधता और पहचान से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को कानूनन वैध माना जाता है। केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर बच्चे की वैधता और पहचान पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने कहा कि यदि पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध न होने यानी 'नॉन-एक्सेस' का कोई ठोस सबूत नहीं है, तो बच्चे की वैधता पर सवाल उठाने का आधार नहीं बनता।
मामला दुर्ग जिले के एक व्यक्ति से जुड़ा है। उसका विवाह 5 मई 2005 को हुआ था और विवाह के दौरान 21 सितंबर 2006 को बेटी का जन्म हुआ। बाद में 15 नवंबर 2016 को पति-पत्नी का आपसी सहमति से तलाक हो गया। तलाक से पहले भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में बेटी का डीएनए टेस्ट कराया गया था। रिपोर्ट में पति के जैविक पिता होने की पुष्टि नहीं हुई।
डीएनए रिपोर्ट के आधार पर पति ने फैमिली कोर्ट में मामला दायर कर बेटी को अपना जैविक बच्चा नहीं बताते हुए स्कूल और अन्य शासकीय दस्तावेजों से अपना नाम हटाने की मांग की थी। दुर्ग फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2025 को उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने हाई कोर्ट में अपील की।
नॉन-एक्सेस साबित करना जरूरी
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अपर्णा अजिंक्य फिरोडिया विरुद्ध अजिंक्य अरुण फिरोडिया और इवान राथिनम विरुद्ध मिलन जोसेफ मामलों के फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 के तहत वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता का मजबूत कानूनी अनुमान होता है।
इस अनुमान को खत्म करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि गर्भाधान की संभावित अवधि में पति-पत्नी एक-दूसरे के संपर्क में नहीं थे। इस मामले में पति ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। इसलिए केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर बेटी के रिकॉर्ड से उसका नाम हटाने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
बच्चे को माता-पिता के विवाद का केंद्र न बनाएं
हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चों को अदालतों में तुच्छ या हल्के आधार पर अपनी वैधता पर सवालों का सामना करने से सुरक्षा मिलनी चाहिए। उन्हें माता-पिता के आपसी विवाद का केंद्र नहीं बनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने बच्चे की पहचान और गरिमा को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वंशावली उसकी पहचान का हिस्सा है और इसे केवल संदेह के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।