पर्व • बंगाल और छत्तीसगढ़ के सूर्योदय में अंतर से बढ़ रही तिथि

बिलासपुर में 300 से अधिक स्थानों पर होगी पूजा, 18 और 19 अक्टूबर को अष्टमी

बिलासपुर। कोलकाता के बाद बिलासपुर की दुर्गापूजा अपनी बंगाली परंपरा और भव्य आयोजन के लिए जानी जाती है। शहर में करीब 300 स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा की जाती है। बंगाल की परंपरा के अनुसार अधिकांश पंडालों में इस बार 5 दिन पूजा होगी। अष्टमी की तिथि दो दिन रहने के कारण भक्तों को एक दिन ज्यादा माता के दर्शन मिलेंगे।

पं. धनंजय भट्टाचार्य के अनुसार छत्तीसगढ़ और बंगाल में सूर्योदय के समय करीब 25 से 30 मिनट का अंतर होने से तिथि की गणना में अंतर आ रहा है। इस बार महाअष्टमी 18 अक्टूबर को सुबह 8.27 बजे शुरू होकर 19 अक्टूबर को सुबह 10.51 बजे तक रहेगी। संधि पूजा अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के शुरुआती 24 मिनट में होती है। इस कारण 18 और 19 अक्टूबर को अष्टमी की पूजा होगी। 20 अक्टूबर को नवमी और 21 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी।

बंगाली परंपरा से पूजा करने वाली समितियों में बंगाली समिति तोरवा, मिलन मंदिर, कंस्ट्रक्शन कॉलोनी दुर्गोत्सव समिति, बांधव समिति आरटीएस कॉलोनी, गोल बाजार, तिलक नगर दुर्गोत्सव समिति, कोन्हेर गार्डन और चुचुहियापारा समिति सहित अन्य पंडाल शामिल हैं।

16 को आमंत्रण अधिवास, 17 को नवपत्रिका

16 अक्टूबर को षष्ठी पर घट स्थापना और आमंत्रण अधिवास होगा। इसके तहत बेल की डाली को प्रतिमा स्थल पर रखा जाएगा और पूजा कर माता को विराजमान होने का आमंत्रण दिया जाएगा। 17 अक्टूबर को सप्तमी पर नवपत्रिका पूजा होगी। केले के साथ बेल, धान, कोचई, मान, हल्दी, अपराजिता, अशोक और अनार की डालियां बांधकर नदी में स्नान कराया जाएगा। इसके बाद इसे पंडाल में गणेशजी के पास स्थापित कर पूजा की जाएगी।

18 और 19 अक्टूबर को अष्टमी व संधि पूजा होगी। 19 अक्टूबर की सुबह संधि पूजा के दौरान 108 दीपक सहित विभिन्न पूजन सामग्रियों से माता का श्रृंगार किया जाएगा। इसके बाद प्रतीकात्मक रूप से रखिया और खीरा की बलि दी जाएगी। 20 अक्टूबर को नवमी पर हवन, पुष्पांजलि और प्रसाद वितरण होगा। 21 अक्टूबर को दशमी पर बंगाली पंडालों में सिंदूर दान की परंपरा निभाई जाएगी।

पंडित, ढोल-ताशा और भोग के लिए 27.96 लाख खर्च

बंगाली परंपरा के अनुसार पूजा के लिए इस बार भी बंगाल से पंडित, ढोल-ताशा दल और भोग बनाने वाले कारीगर बुलाए जा रहे हैं। 78 पंडित 5 दिन पूजा कराएंगे, जिन्हें कुल 10.14 लाख रुपए दिए जाएंगे। वहीं ढोल-ताशा और भोग बनाने वाले 162 लोगों को 11 हजार रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से कुल 17.82 लाख रुपए दिए जाएंगे। इस तरह पंडित, ढोल-ताशा और भोग की व्यवस्था पर कुल 27.96 लाख रुपए खर्च होंगे।

78 साल से एक ही लकड़ी पर बन रही माता की प्रतिमा

मिलन मंदिर में माता की प्रतिमा बनाने की परंपरा भी खास है। यहां 78 साल से उसी लकड़ी पर प्रतिमा बनाई जा रही है, जिस पर 1956 में पहली बार माता की प्रतिमा तैयार की गई थी। इस लकड़ी को ‘काठमो’ कहा जाता है। विसर्जन के बाद समिति के सदस्य इसे वापस लाकर सुरक्षित रखते हैं और अगले वर्ष रथयात्रा के दिन इसकी पूजा कर प्रतिमा निर्माण के लिए निकालते हैं। प्रतिमा बनाने के लिए कोलकाता और गंगा से मिट्टी मंगाकर स्थानीय मिट्टी में मिलाई जाती है।