बिलासपुर बंगाली समाज के तत्वावधान में गत १० अक्टूबर २०२६ को बंगाली समाज मंच पर एक मनमोहक आगमनी सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। संगठन के सदस्यों और कलाकारों की उत्स्फूर्त भागीदारी से यह कार्यक्रम संगीत, नृत्य, कविता और साहित्य-साधना का एक सुंदर मिलन समारोह बन गया।


१९९५ में श्री अखिल रंजन घोष द्वारा स्थापित यह संगठन लंबे समय से बिलासपुर में बंगाली संस्कृति, परंपरा और सामाजिक सद्भाव की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। वर्तमान में संगठन के अध्यक्ष श्री देवाशीष नंदी, सचिव श्री बिलास कुमार दास और कोषाध्यक्ष श्री जीवन घोष के नेतृत्व में संगठन अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों को आगे बढ़ा रहा है।


समारोह का शुभारंभ और श्रद्धांजलि


समारोह का शुभारंभ रवींद्र संगीत ‘आकाशभरा सूर्य-तारा’ की प्रस्तुति से हुआ। इसके बाद संगठन के सदस्यों ने सामूहिक स्वर में ‘ओ मेनका, ओ मेनका’ प्रस्तुत किया। सुर और ताल के वातावरण में आगमनी संध्या का शुभारंभ आनंदमय और उत्सवपूर्ण बन गया।


अध्यक्ष श्री देवाशीष नंदी ने उपस्थित सभी लोगों को महालया और देवीपक्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं। इसके बाद हाल ही में दिवंगत श्री श्यामा दास घोष की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया। बंगाली समाज के प्रमुख स्तंभ के रूप में परिचित इस विशिष्ट व्यक्तित्व के निधन पर उपस्थित सभी लोगों ने गहरा शोक और श्रद्धा व्यक्त की।


संगीत के सुरों में आगमनी का वातावरण


संध्या के सांस्कृतिक सत्र में संगीत प्रस्तुत करने वालों में श्रीमती मौमिता चक्रवर्ती, श्रीमती प्रतिमा पाल, श्रीमती मौसुमी चक्रवर्ती, श्रीमती स्वागता चौधरी, श्री शुभ्रांशु शेखर घोष, श्री सौरभ चक्रवर्ती, श्रीमती अपराजिता चौधरी, श्रीमती अपर्णा घोष, श्रीमती जयश्री भट्टाचार्य, श्रीमती रेखा दास, श्रीमती स्वस्तिका विश्वास, श्रीमती स्वागता सूर, श्री देवाशीष नंदी, श्री राजा दासगुप्ता और श्रीमती कल्याणी दे शामिल थे।


डॉक्टर सुदीप्त दत्त की सैक्सोफोन प्रस्तुति ने समारोह में विशेष आकर्षण जोड़ा। उनके वाद्ययंत्र के सुरों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।


कविता, हास्य-रचना और नृत्य की विविधता


सांस्कृतिक संध्या में मास्टर आयुष प्रमाणिक ने कविता का पाठ किया। डॉ. सोमनाथ मुखर्जी ने अपनी हास्य-रचना के पाठ से दर्शकों का मनोरंजन किया।


श्रीमती गोपा दासगुप्ता के निर्देशन में सुपर्णा राय गुप्ता, सुस्मिता राय, श्रीमती सुस्मिता घोष, श्रीमती पूजा प्रमाणिक, श्रीमती मौमिता चक्रवर्ती, श्रीमती श्रुति साहा, श्रीमती अदिति याग्यासी और श्रीमती सुमिता दास ने नृत्य प्रस्तुत किया। नृत्य प्रस्तुति में कलाकारों की दक्षता और सहज अभिव्यक्ति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।


समारोह का एक प्रमुख आकर्षण श्री राजा दाशगुप्त के निर्देशन में प्रस्तुत कविता का कोलाज था। इसमें श्रीमती सोमा मुखर्जी, श्रीमती स्वस्तिका विश्वास, श्रीमती स्वागता सूर, श्रीमती गोपा दासगुप्ता, श्रीमती प्रतिमा पाल, श्रीमती उमा दास, श्रीमती ईप्सिता दत्त और श्रीमती जयश्री भट्टाचार्य ने भाग लिया। कविता और पाठ की इस संयुक्त प्रस्तुति ने समारोह को साहित्यिक रस से समृद्ध कर दिया।


पर्दे के पीछे सहयोग और मंच संचालन


समारोह के संगीत संयोजन में कैलाश डोडवानी ने सहयोग किया और तबले पर जय दे ने संगत की। श्री अशोक बोस और श्री संगीत मैत्र ने कार्यक्रम के आयोजन में सहयोग का हाथ बढ़ाया। पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन श्री राजा दासगुप्ता ने किया।


विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति


इस सांस्कृतिक संध्या में श्री मानव चटर्जी, श्री तमाल चटर्जी, श्री बी. सी. गोलदार, श्री प्रवीर सेनगुप्ता, डॉ. सुदीप्त दत्त, श्री कौशिक मित्र, श्री सिद्धार्थ भट्टाचार्य, श्री चंदन कुमार गांगुली, बी.बी.पी.एल. के संस्थापक श्री प्रवीर घोष, श्री सुब्रत चट्टोपाध्याय, श्री संदीप चटर्जी, श्रीमती तृप्ति चटर्जी, श्रीमती स्वप्ना जाना, डॉ. सोमनाथ मुखर्जी और श्री विभु रंजन घोष सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति और संस्कृतिप्रेमी उपस्थित थे।


बंगाली संस्कृति की परंपरा के संरक्षण का एक आंतरिक प्रयास


बिलासपुर बंगाली समाज का यह आगमनी समारोह केवल एक सांस्कृतिक संध्या नहीं, बल्कि बंगाली शारदोत्सव, मातृभाषा, साहित्य और कला के प्रति प्रेम की एक আন্তरिक अभिव्यक्ति है। संगीत, नृत्य, पाठ और कविता के कोलाज के माध्यम से कलाकारों ने दुर्गापूजा के आगमनी वातावरण को जीवंत बना दिया।


१९९५ से शुरू हुई सांस्कृतिक यात्रा आज भी वर्तमान नेतृत्व और सदस्यों के सामूहिक प्रयासों से निरंतर आगे बढ़ रही है। सभी की सक्रिय भागीदारी और सहयोग यह सिद्ध करता है कि प्रवास में रहते हुए भी बंगाली संस्कृति और सामाजिक बंधन को प्रेम और निष्ठा के साथ संजोया जा सकता है।


बिलासपुर बंगाली समाज के शारद उत्सव २०२६ की यह आगमनी संध्या संगठन की सांस्कृतिक एकता, कलाकारों के समर्पण और बंगाली समाज की चिरंतन परंपरा के एक उज्ज्वल उदाहरण के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगी।