तखत और पेट्रोमैक्स से शुरू हुई रामलीला, 76 साल का सफर; चार पीढ़ियां संभाल रहीं परंपरा


बिलासपुर। तखत का मंच, पेट्रोमैक्स की पीली रोशनी और रामायण के प्रसंगों को जीवंत करते कलाकार। करीब 76 साल पहले शुरू हुई रेलवे क्षेत्र की रामलीला का शुरुआती स्वरूप कुछ ऐसा ही था। समय के साथ मंच और व्यवस्थाएं बदलीं, आयोजन का दायरा बढ़ा, लेकिन परंपरा आज भी कायम है। वर्ष 1950 में चुचुहियापारा फाटक के पास हिंदी भाषी रेलकर्मियों और बुधवारी मालधक्का के रामायण प्रेमी व्यापारियों ने 4-5 हजार रुपए के बजट से इसकी शुरुआत की थी। आज आयोजन का बजट करीब 8 लाख रुपए तक पहुंच गया है और तीन-चार पीढ़ियां मिलकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

हिंदुस्तानी सेवा समाज के 76वें श्रीरामलीला एवं दशहरा उत्सव में इस वर्ष उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित हंसपुर, नवस्ता की जय महाकाली नाट्य कला मंच की मंडली रामलीला का मंचन कर रही है। रामलीला भवन में प्रतिदिन शाम 7 से रात 10:30 बजे तक प्रस्तुतियां हो रही हैं। उत्सव का समापन 20 अक्टूबर को नॉर्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट मैदान में 65 फीट ऊंचे रावण के दहन और भव्य आतिशबाजी के साथ होगा।

तखत से रामलीला भवन तक पहुंचा मंच

हिंदुस्तानी सेवा समाज परिवार के अध्यक्ष एचएस भदौरिया ने बताया कि शुरुआती दौर में चुचुहियापारा फाटक के पास तखत जोड़कर मंच तैयार किया जाता था। पेट्रोमैक्स की रोशनी में कलाकार रामायण के प्रसंग प्रस्तुत करते थे। उस समय संसाधन सीमित थे और आयोजन की तैयारियां स्थानीय स्तर पर ही होती थीं। 15 दिन के मंचन के लिए कलाकारों को 200 से 250 रुपए तक पारिश्रमिक मिलता था।

धीरे-धीरे रामलीला से लोगों का जुड़ाव बढ़ा और इसका मंचन रामलीला भवन तक पहुंच गया। आयोजन से जुड़े परिवारों की अगली पीढ़ियां भी इसमें शामिल होती गईं। मालधक्का का स्थान बदल गया, लेकिन वहां से जुड़े परिवारों का सहयोग आज भी बना हुआ है। इसी निरंतरता ने रामलीला को रेलवे परिक्षेत्र की पहचान बना दिया है।

भदौरिया के अनुसार, पिछले वर्ष आयोजन पर करीब 7.64 लाख रुपए खर्च हुए थे, जबकि इस बार लगभग 8 लाख रुपए का बजट रखा गया है। आयोजन की व्यवस्थाओं में कार्यकारी अध्यक्ष एसके मालेवार, दशहरा उत्सव समिति के अध्यक्ष यूएस पाण्डेय और रामलीला समिति के अध्यक्ष एमके झा सहित अन्य सदस्य जुटे हुए हैं।

धनुष भंग प्रसंग में श्रीराम का शौर्य

मंगलवार को रामलीला में अहिल्या उद्धार, भगवान श्रीराम के नगर भ्रमण और धनुष यज्ञ के प्रसंगों का मंचन किया गया। अहिल्या उद्धार के बाद श्रीराम के नगर भ्रमण का दृश्य प्रस्तुत हुआ। इसके बाद जनक दरबार में धनुष यज्ञ का आयोजन दिखाया गया, जहां विभिन्न राजा शिवधनुष उठाने का प्रयास करते हैं। अंत में भगवान श्रीराम धनुष भंग कर अपनी शक्ति का परिचय देते हैं।

इस वर्ष श्रीराम की भूमिका अंजनेश त्रिपाठी, लक्ष्मण की शिवम वाजपेयी, सीता की अभय मिश्रा, दशरथ की सुदेश मिश्रा पई और विश्वामित्र की भूमिका पिंकेश वाजपेयी निभा रहे हैं। मंडली के मंडलाधीश भोला भयंकर हैं।

लक्ष्मण-परशुराम संवाद के लिए कानपुर से आएंगे कलाकार

बुधवार को लक्ष्मण-परशुराम संवाद का मंचन होगा। इस प्रसंग में दोनों पात्रों के ओज और रौद्र भाव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए समिति ने कानपुर से विशेष कलाकारों को बुलाया है। परशुराम की भूमिका राजेश पाण्डेय और लक्ष्मण की भूमिका आनंद अग्निहोत्री निभाएंगे।

मंडली के मंडलाधीश भोला भयंकर ने बताया कि हिंदुस्तानी सेवा समाज लगातार दूसरे वर्ष कानपुर की मंडली को मंचन के लिए बुला रहा है। उनका समूह वर्षभर अलग-अलग स्थानों और कार्यक्रमों में श्रीरामलीला की प्रस्तुतियां देता है।

20 अक्टूबर को 65 फीट के रावण का दहन

दशहरा उत्सव 20 अक्टूबर को शाम 6 बजे से नॉर्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट मैदान में आयोजित होगा। यहां 65 फीट ऊंचे रावण का दहन किया जाएगा, जिसके बाद आतिशबाजी होगी। कार्यक्रम में बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल मुख्य अतिथि होंगे। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक तरुण प्रकाश अध्यक्षता करेंगे। नगर निगम महापौर पूजा विधानी, मंडल रेल प्रबंधक राकेश रंजन, लघु उद्योग संघ के अध्यक्ष हरीश केडिया और शांभवी फाउंडेशन के चेयरमैन मुकेश अग्रवाल विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे।

बच्चों को रामायण समझने का मिलता है अवसर

रेलवे क्षेत्र निवासी निशा सिंह ने बताया कि लोग पूरे साल रामलीला का इंतजार करते हैं। इसके मंचन से बच्चों को रामायण के प्रसंगों को आसानी से समझने का अवसर मिलता है। दशहरा उत्सव समिति के नवीन ने बताया कि रामलीला के दौरान मेला भी लगता है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। रेलवे द्वारा मैदान उपलब्ध कराने से यातायात व्यवस्था प्रभावित नहीं होती।

समिति के सी. नवीन कुमार के अनुसार, आयोजन में रेलवे कर्मचारियों और बुधवारी बाजार के साथ व्यापार विहार के व्यापारी भी सहयोग करते हैं। इससे पहले तीन साल तक रतनपुर के अकलतरी की टीम ने रामलीला का मंचन किया था। उससे पहले चित्रकूट, रीवा, सतना और मंडला की मंडलियां यहां प्रस्तुतियां देती रही हैं।