मुख्य संरक्षिका अमिता पांडे के निधन के बाद मंदिर परिवार का फैसला, इस बार मनोकामना नारियल बांधने और खोलने पर भी रोक
बिलासपुर। हटरी चौक स्थित करीब 155 साल पुराने श्रीराम-सीता-हनुमान मंदिर में इस बार दशहरे पर 155 साल पुरानी परंपरा में बदलाव किया गया है। साल में केवल एक बार दशहरे के दिन खुलने वाले इस मंदिर के पट इस बार शाम की जगह सुबह 7 बजे ही खोल दिए जाएंगे। श्रद्धालु सुबह 7 से शाम 4 बजे तक भगवान के दर्शन कर सकेंगे। वहीं, इस बार भक्त न तो मनोकामना नारियल बांध पाएंगे और न ही मन्नत पूरी होने पर पहले से बंधे नारियल खोल सकेंगे। मंदिर में फूल-पत्ती और नारियल चढ़ाने की अनुमति भी नहीं होगी।
मंदिर की देखरेख करने वाली मुख्य संरक्षिका अमिता पांडे का करीब तीन महीने पहले निधन हो गया था। इसके बाद मंदिर परिवार ने इस वर्ष धार्मिक व्यवस्थाओं में बदलाव का निर्णय लिया है। अब मंदिर की देखरेख और सेवा की जिम्मेदारी हरिश्चंद्र पांडे और दिनेश चंद्र पांडे संभालेंगे। मंदिर परिवार के इस फैसले के चलते इस बार श्रद्धालुओं को कुछ बदली हुई व्यवस्थाओं के बीच दर्शन करने होंगे।
सुबह से ही शुरू होंगे दर्शन, 9 घंटे खुले रहेंगे पट
मंदिर परिवार के बुद्धेश्वर शर्मा (सीटू) ने बताया कि पहले दशहरे के दिन मंदिर शाम 4 से रात 7 बजे तक खुलता था। श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ने और लंबी कतारों के कारण कई भक्तों को दर्शन नहीं मिल पाते थे। इसके बाद मंदिर खुलने का समय बढ़ाकर शाम 4 से रात 9 बजे तक कर दिया गया था। इस बार पहली बार सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक दर्शन की व्यवस्था की गई है। इस तरह श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए कुल 9 घंटे मिलेंगे।
800 मनोकामना नारियल बंधे, इस बार नहीं खुलेंगे
मंदिर में वर्तमान में करीब 800 मनोकामना नारियल बंधे हुए हैं। पिछले साल 260 श्रद्धालुओं की मन्नतें पूरी हुई थीं और उन्होंने मंदिर पहुंचकर अपने नारियल खोले थे। वहीं, 115 श्रद्धालुओं ने नई मनोकामना के साथ नारियल बांधे थे। लेकिन इस बार श्रद्धालुओं को यह अवसर नहीं मिलेगा। मंदिर में फूल-पत्ती और नारियल चढ़ाने पर भी रोक रहेगी। दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को बाहर से ही बैरिकेडिंग के जरिए व्यवस्था के अनुसार आगे बढ़ना होगा।
बुद्धेश्वर शर्मा ने बताया कि इस बार व्यवस्था में बदलाव किया गया है। अगले वर्ष पुरानी परंपराएं फिर शुरू की जा सकती हैं।
दशहरे पर ही क्यों खुलते हैं मंदिर के पट?
पं. शर्मा के अनुसार, पूर्वजों से चली आ रही मान्यता के मुताबिक, पहले यहां नीम का एक पेड़ था, जो सूखकर अपने आप गिर गया था। पेड़ गिरने के बाद उसकी जड़ों से भगवान श्रीराम, माता जानकी और भाई लक्ष्मण की प्रतिमाएं निकली थीं। इसके बाद विधि-विधान से मंदिर की स्थापना की गई।
मान्यता है कि मंदिर खोलने और प्रतिमाओं को स्पर्श करने के बाद कुछ अप्रिय घटनाएं हुई थीं। इसके बाद मंदिर को सालभर बंद रखने की परंपरा शुरू हुई। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दशहरे के दिन भगवान प्रसन्न रहते हैं और भक्तों की गलतियों को क्षमा करते हैं। इसी वजह से साल में केवल एक बार दशहरे पर मंदिर के पट खोले जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर परिवार के सदस्य नियमित रूप से दिन में तीन बार भगवान की पूजा करते हैं।
दूसरे राज्यों से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
हटरी चौक स्थित इस प्राचीन मंदिर में दशहरे के दिन बिलासपुर के अलावा मुंबई, दिल्ली, हरियाणा, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर खुलने से करीब दो घंटे पहले ही एक किलोमीटर से अधिक लंबी कतार लग जाती है। कई भक्त एक दिन पहले ही शहर पहुंच जाते हैं। मंदिर परिवार के अनुसार, इस बार भी दशहरे से पहले ही दूसरे शहरों से श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया है।