शंख, ढाक और कांसी की गूंज के बीच शुरू हुई दुर्गा पूजा; अरपा तट पर विधि-विधान से हुआ कोला बऊ स्नान, पंडालों में महा सप्तमी की पूजा
बिलासपुर। शहर में बंगाली समाज की दुर्गा पूजा की परंपरा 103 साल पुरानी हो गई है। इस वर्ष भी बंगाल की पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। शुक्रवार को षष्ठी तिथि पर पंडालों में पूजा की शुरुआत हुई। शंख की ध्वनि, ढाक और कांसी बाजे की गूंज के बीच भक्तों ने बेल की डाली पर मां का आह्वान किया। शाम को आमंत्रण और अधिवास की रस्म निभाई गई। शनिवार को सप्तमी तिथि पर कोला बऊ स्नान और महा सप्तमी की पूजा के साथ उत्सव ने पारंपरिक रंग ग्रहण किया।
बंगाली समाज की दुर्गा पूजा में हर साल पंडाल की सजावट और स्वरूप बदलता है, लेकिन मां दुर्गा की प्रतिमा की पारंपरिक बनावट में बदलाव नहीं होता। बंगाल की परंपरा के अनुसार मां के साथ भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। गणेश बुद्धि, लक्ष्मी धन-समृद्धि, सरस्वती ज्ञान और कार्तिकेय शौर्य के प्रतीक माने जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवताओं ने अपनी शक्तियां और अस्त्र मां दुर्गा को सौंपे थे, जिनके बल पर उन्होंने महिषासुर का वध कर धर्म की रक्षा की।
षष्ठी पर बेल की डाली से मां का आह्वान
दुर्गा पूजा की शुरुआत महाषष्ठी की रस्मों से होती है। इस दिन मां दुर्गा के आगमन का आह्वान किया जाता है। बंगाली परंपरा में बेल वृक्ष की डाली का विशेष महत्व है। भक्त मंत्रोच्चार और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के बीच बेल की डाली पर मां का आह्वान करते हैं। शाम को आमंत्रण और अधिवास की रस्म निभाई जाती है। आमंत्रण में मां को पूजा के लिए आमंत्रित किया जाता है, जबकि अधिवास में पूजा से संबंधित वस्तुओं और स्थान को विधि-विधान से पवित्र किया जाता है। इन रस्मों के साथ पंडालों में महा सप्तमी की तैयारी पूरी की जाती है।
सप्तमी पर अरपा तट पहुंचा बंगाली समाज
तोरवा धान मंडी चौक स्थित श्री श्री विवेकानंद दुर्गा लक्ष्मी उत्सव समिति इस वर्ष दुर्गा पूजा का 20वां आयोजन कर रही है। शनिवार सुबह महा सप्तमी के अवसर पर समाज के महिला-पुरुष पुजारी के साथ अरपा नदी के छठ घाट पहुंचे। वहां शंख, ढाक और कांसी की ध्वनि के बीच बंगाली परंपरा के अनुसार कोला बऊ को स्नान कराया गया। इसके बाद उन्हें विधि-विधान से पंडाल में स्थापित किया गया और महा सप्तमी की पूजा-अर्चना की गई।
बंगाली परंपरा में कोला बऊ यानी केले के पौधे को दुल्हन के रूप में सजाकर स्नान कराने की रस्म विशेष महत्व रखती है। केले के पौधे के साथ अन्य आठ पवित्र वनस्पतियों को मिलाकर नवपत्रिका तैयार की जाती है। इसे स्नान कराने के बाद नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और मां दुर्गा के साथ स्थापित किया जाता है। इसे देवी की नौ शक्तियों का प्रतीक माना जाता है। इस रस्म के साथ महा सप्तमी की पूजा आरंभ होती है।
महा सप्तमी पर मां दुर्गा की विधिवत पूजा, मंत्रोच्चार और पुष्पांजलि के माध्यम से श्रद्धालु सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। बंगाल की परंपरा के अनुरूप बिलासपुर में भी षष्ठी से सप्तमी तक पूजा की प्रत्येक रस्म पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। शंख, ढाक और कांसी की गूंज से पंडालों में बंगाल की सांस्कृतिक छटा दिखाई दे रही है।