बिलासपुर। कुछ लोग केवल अपने लिए नहीं जीते। दूसरों की तकलीफ उन्हें बेचैन करती है और किसी जरूरतमंद की मदद के लिए उठाया गया उनका एक कदम कई बार किसी परिवार के लिए बड़ी उम्मीद बन जाता है। धनंजय गिरी गोस्वामी भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने वर्षों तक दूसरों के लिए खड़े होकर सेवा और सहयोग को अपने जीवन का हिस्सा बनाया। लेकिन वक्त का पहिया आज कुछ ऐसा बदला है कि हमेशा दूसरों का सहारा बनने वाले धनंजय स्वयं जिंदगी की कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं और उन्हें अब समाज के सहारे की जरूरत है।

बिलासपुर में धनंजय गिरी गोस्वामी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वर्षों से वे समाज के अलग-अलग वर्गों के लोगों की मदद के लिए तत्पर रहे हैं। किसी जरूरतमंद की चिकित्सा सहायता की बात हो, गरीब और असहाय व्यक्ति के अधिकारों की लड़ाई हो अथवा थाना, कोर्ट-कचहरी जैसे मुश्किल रास्तों पर किसी बेसहारा व्यक्ति को मदद की जरूरत हो—धनंजय हमेशा आगे खड़े नजर आए।

उनकी खासियत यही रही कि मदद करने से पहले उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि सामने वाला किस वर्ग, समाज या विचारधारा से जुड़ा है। किसी की परेशानी को अपनी परेशानी समझना और उसके समाधान के लिए प्रयास करना उनके स्वभाव में रहा है। शायद यही वजह है कि बिलासपुर के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में भी वे अपने मिलनसार व्यवहार, सामाजिक सक्रियता और निस्वार्थ सेवा भावना के कारण लोगों के बीच परिचित रहे हैं।

राजनीति में सक्रिय रहे, लेकिन रिश्ते हमेशा दिलों से बनाए

धनंजय गिरी गोस्वामी का राजनीतिक जुड़ाव भी रहा है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ प्रदेश स्तर पर कार्य किया और संगठनात्मक एवं सामाजिक गतिविधियों में अपनी भूमिका निभाई। लेकिन उनका व्यक्तित्व किसी राजनीतिक सीमा में बंधा नहीं रहा। अपने सहज, सरल और मिलनसार स्वभाव के कारण विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोगों के साथ भी उनके आत्मीय संबंध रहे।

वे पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोकप्रिय नेता स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव के काफी करीबी रहे। जूदेव परिवार से उनका लंबे समय से आत्मीय जुड़ाव रहा है। उनके पुत्र प्रबल प्रताप सिंह जूदेव के साथ भी धनंजय कई वर्षों तक जुड़े रहे और सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे।

आज वही धनंजय अपने लिए मदद की तलाश में हैं

जिंदगी में शायद सबसे कठिन क्षण वह होता है, जब कोई व्यक्ति दूसरों के लिए सब कुछ करने की स्थिति में रहा हो, लेकिन एक दिन स्वयं सहायता की आवश्यकता महसूस करने लगे।

आज धनंजय गिरी गोस्वामी के जीवन में वही कठिन समय है।

गंभीर बीमारी से जूझ रहे धनंजय बेहतर इलाज की तलाश में बिलासपुर से रायपुर और अब वेल्लोर तक पहुंच चुके हैं। बीमारी ने उन्हें शारीरिक रूप से इतना कमजोर कर दिया है कि अब वे अपने पैरों पर खड़े होने में भी असमर्थ हो रहे हैं। जिस व्यक्ति की पहचान हमेशा सक्रियता, लोगों के बीच मौजूदगी और दूसरों की मदद के लिए दौड़ पड़ने वाले व्यक्तित्व के रूप में रही, आज उसी व्यक्ति को इलाज के लिए दूसरों के सहयोग की आवश्यकता है।

बताया जा रहा है कि बेहतर उपचार और चिकित्सा सहायता के लिए उन्होंने और उनके शुभचिंतकों ने कई स्तरों पर संपर्क किया तथा सहयोग की अपेक्षा रखी, लेकिन उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिल सकी। हालांकि, इस मुश्किल घड़ी में उनका परिवार, मित्र, शुभचिंतक और समाज के लोग उनके साथ खड़े हैं। इन्हीं के सहयोग से वर्तमान में वेल्लोर में उनका उपचार जारी है।

जिंदगी ने आज एक सवाल समाज के सामने रख दिया है

धनंजय की कहानी केवल बीमारी और इलाज की कहानी नहीं है। यह उस रिश्ते की कहानी भी है, जो एक व्यक्ति वर्षों तक समाज के साथ बनाता है।

जिस व्यक्ति ने कभी किसी जरूरतमंद के दरवाजे पर दस्तक देने में देर नहीं की, आज उसके अपने दरवाजे पर मदद की जरूरत खड़ी है।

जिन हाथों ने दूसरों को उठाया, आज वही हाथ किसी सहारे की तलाश में हैं।

जिस आवाज ने वर्षों तक दूसरों की परेशानियों को सामने रखा, आज उसी आवाज को समाज तक अपनी पीड़ा पहुंचाने के लिए मदद की जरूरत है।

और शायद यही वह समय है जब समाज को भी अपने उस साथी की ओर मुड़कर देखना चाहिए, जिसने लंबे समय तक बिना किसी स्वार्थ के लोगों के लिए खड़े होने का प्रयास किया।

उम्मीद अब समाज से है

धनंजय गिरी गोस्वामी की इस कठिन परिस्थिति की जानकारी जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, राजनीतिक साथियों, मित्रों, शुभचिंतकों और समाज के सक्षम लोगों तक पहुंचे—यही इस खबर का उद्देश्य है।

किसी की जिंदगी बचाने के लिए हमेशा बड़ी मदद ही जरूरी हो, ऐसा नहीं है। कई बार छोटी-छोटी मदद मिलकर किसी परिवार के लिए बड़ी उम्मीद बन जाती है।

आज धनंजय को भी उसी उम्मीद की जरूरत है।

उम्मीद है कि उनकी कहानी उन लोगों तक पहुंचेगी, जिनके पास उनकी चिकित्सा में सहयोग करने की क्षमता और संवेदना है। शायद किसी जनप्रतिनिधि का एक प्रयास, किसी सामाजिक संगठन की पहल, किसी मित्र का सहयोग या किसी सक्षम व्यक्ति की मदद उनके उपचार की राह को कुछ आसान कर सके।

क्योंकि समाज की असली पहचान यही है कि जब कोई कमजोर पड़ जाए, तो उसके लिए कई मजबूत हाथ आगे बढ़ें।

धनंजय गिरी गोस्वामी ने वर्षों तक दूसरों के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए हैं। आज वक्त ने उनसे एक ऐसी लड़ाई लड़ने को कहा है, जिसे वे अकेले नहीं लड़ सकते।

आज उन्हें समाज के उन हाथों की जरूरत है, जिनके लिए वे कभी स्वयं सहारा बने थे।

शायद यह खबर पढ़ने वाला कोई एक व्यक्ति उनके लिए मदद का हाथ बढ़ा दे।

और कभी दूसरों के लिए उम्मीद बनने वाला यह व्यक्ति फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो सके—

यही इस समय सबसे बड़ी उम्मीद है।