दुर्गा नवमी पर किया गया हवन एवं कन्या पूजन , कुंवारी कन्या की पूजा करते हुए लिया गया उनका आशीर्वाद, व्रत धारियों ने किया परायण

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प्रवीर भट्टाचार्य

शारदीय नवरात्रि की अष्टमी एवं नवमी तिथि पर मंदिर और घरों में हवन एवं कन्या पूजन किया गया। पिछले 8 दिनों से जारी शक्ति उपासना का महापर्व नवरात्रि भी इसी के साथ संपन्न हुआ तो वही व्रत धारियों ने व्रत का पारायण किया। कुंवारी कन्याओं में देवी के सभी नौ स्वरूप उपस्थित होने की मान्यता के साथ नवरात्र तिथि पर कन्या पूजन की परंपरा है । भारतीय सनातनी धर्म में स्त्री को देवी माना जाता है और कुंवारी कन्याओं को मां दुर्गा स्वरूपा। यही कारण है कि नवरात्रि की अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन की परंपरा है। मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए जिन्होंने 9 दिनों का व्रत रखा उनके द्वारा भी महानवमी पर कम से कम 9 कन्याओं का पूजन कर उन्हें भोजन कराते हुए दक्षिणा प्रदान किया गया ।कन्या पूजन के साथ बटुक पूजन का भी विधान है। इसका भी पालन करते हुए इस अवसर पर बालक को बटुक भैरव का प्रतीक मानते हुए कन्याओं के साथ उनका भी पूजन कर भोग अर्पित किया गया।


इससे पहले मां के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा अर्चना की गई। सामान्यतः इस दिन 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष की आयु तक की कन्याओं के पूजन का विधान है। इस दिन कन्याओं को तिलक लगाकर उनकी आरती उतारी गई। फिर उनके चरण छूकर आशीर्वाद लिया गया। मान्यता है कि मां वैष्णो देवी के परम भक्त पंडित श्रीधर ने संतान प्राप्ति के लिए कुंवारी कन्याओं को अपने घर बुलाया था। मां वैष्णो देवी भी कन्या स्वरूप में उनके बीच में आकर बैठ गई। पूजन के बाद सभी कन्याए लौट गयी लेकिन माता नहीं गई । उस कन्या की बात मानकर श्रीधर ने गांव में भंडारे का संदेश दिया जिससे उसके घर संतान की उत्पत्ति हुई। तब से कन्या पूजन और कन्या भोजन की परंपरा है । वही नवरात्र के अंतिम दिवस हवन कर आहुति भी अर्पित की गई। अंचल के सभी दुर्गा मंदिरों में भी इस परंपरा का पालन किया गया।

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